चेन्नई। मद्रास उच्च न्यायालय ने कहा है कि मातृत्व लाभ, विशेष रूप से कर्मचारियों की तीसरी गर्भावस्था के लिए अवकाश स्वीकृत करने में सरकार को किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करना चाहिए। न्यायमूर्ति आर सुरेश कुमार और एन सेंथिल कुमार की खंडपीठ ने शायी निशा की याचिका को स्वीकार करते हुए 28 अप्रैल को यह फैसला सुनाया। पीठ ने विल्लुपुरम के प्रधान जिला न्यायाधीश के 27 मार्च, 2026 के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें याचिकाकर्ता द्वारा दो फरवरी, 2026 से एक फरवरी, 2027 तक मातृत्व अवकाश के अनुरोध वाले आवेदन को खारिज कर दिया गया था।
साथ ही पीठ ने मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण, विल्लुपुरम के उस आदेश को भी रद्द कर दिया जिसमें याचिकाकर्ता को 27 अप्रैल, 2026 को फिर से कार्यभार ग्रहण करने के लिए कहा गया था। पीठ ने जिला न्यायाधीश को निर्देश दिया कि वह निशा द्वारा प्रस्तुत आवेदन पर विचार करें और 13 मार्च, 2026 के सरकारी आदेश (जीओ) को स्वीकार नहीं करते हुए एक सप्ताह के भीतर निशा को पहली और दूसरी गर्भावस्था वाली महिलाओं के समान मातृत्व अवकाश स्वीकृत करें।
याचिकाकर्ता के अनुसार, उसने अपनी तीसरी गर्भावस्था के लिए मातृत्व अवकाश मांगा था, जिसे प्रधान जिला न्यायाधीश, विलुपुरम ने 27 मार्च, 2026 को पारित आदेश के माध्यम से मानव संसाधन प्रबंधन (एफआर-3) विभाग के जी ओ (एमएस) संख्या 18 का हवाला देते हुए अस्वीकार कर दिया था। उच्चतम न्यायालय के एक फैसले और मद्रास उच्च न्यायालय की खंडपीठ के फैसलों का हवाला देते हुए न्यायाधीशों ने कहा कि खंडपीठ के 21 जनवरी, 2026 के आदेश की प्रति प्राप्त होने और उसका संदर्भ देने के बाद सरकार ने उक्त सरकारी आदेश जारी करने के लिए कदम उठाया है, जिसके तहत तीसरी गर्भावस्था के लिए मातृत्व अवकाश की अनुमति दी गई है, लेकिन इसे केवल 12 सप्ताह, यानी तीन महीने तक सीमित कर दिया गया है।
पीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 162 के तहत प्रदत्त कार्यकारी शक्ति का प्रयोग करते हुए सरकार द्वारा सरकारी आदेश जारी करके उच्चतम न्यायालय और इस न्यायालय के निर्णयों के विरुद्ध इस प्रकार का प्रतिबंध लगाना स्वीकार्य नहीं है। पीठ ने कहा कि अवकाश की अवधि को 12 सप्ताह तक सीमित करने के मामले में सरकार की ओर से कोई कारण नहीं बताया गया था। पीठ के अनुसार, चाहे पहली, दूसरी या तीसरी गर्भावस्था हो, पीड़ा एक समान ही होती है और प्रसव पूर्व एवं प्रसव के बाद देखभाल महिलाओं को ही करनी पड़ती है। पीठ ने कहा कि यह गर्भावस्था की सभी स्थिति पर समान रूप से लागू होता है। इसलिए, कर्मचारियों को मातृत्व लाभ, विशेष रूप से तीसरी गर्भावस्था के लिए मातृत्व अवकाश स्वीकृत करने में सरकार द्वारा कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता।





