क्रोध का संबंध मन के अन्य विकारों से घनिष्ठ है। क्रोध के वशीभूत होकर हमें उचित अनुचितका विवेक नहीं रहता और हम हाथापाई कर बैठते हैं। बातों-बातों में ही उखड़ पड़ना, लड़ाई झगड़ा करना, साधारण सी बात है। यदि तुरंत क्रोध का प्रकाशन हो जाये तब तो मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से ठीक है पर यदि वह अंत: प्रदेश में पहुंचकर एक भावना ग्रंथि बन जाये तो मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से ठीक नहीं है। पर यदि वह अंत: प्रदेश में पहुंचकर एक भावना ग्रंथि बन जाये तो दुखदयी होता है। बहुत दिनों तक टिका हुआक्रोध वैर कहलाता है।
बैर एक ऐसी मानसिक बीमारी है जिसका कुफल मनुष्य को दैनिक जीवन में भुगतना पड़ताहै। वह अपने आपको संतुलित नहीं रख पाता। जिससे उसे बैर है उसके उत्तर गुण, भलाई, पुराना प्रम, उच्च संस्कार, आदि सब विस्मृत कर बैठता है। स्थायी रूप से एक भावना ग्रंथि बन जाने से क्रोध कावेग तो धीमा पड़ जाता है किन्तु दूसरे व्रूक्ति को सजा देने, नुकसन पहुंचाने या पीड़ित करने की कुत्सित भावना निरन्तर मन को दग्ध किया करती है।
बैर पुरानी जीर्ण मानसिक बीमारी है, क्रोध तात्कालिक और क्षणिक प्रमाद है। क्रोध में पागल होकर हम सोचने का समय नहीं देखते, बैर उसके लिए बहुत समय लेता है। क्रोध में अस्थिरता, क्ष्ज्ञणिकता, तात्कालीनता, बुद्धि का कुंठित हो जाना, उद्विग्नता, आत्मरक्षा, अहंकार की पुष्टि, असहिष्णुता, दूसरे को दण्डित करने की भावनाएं संयुक्त है। क्रोध मन के एक उत्तेजित औरखिंची हुई स्थिति में रख देता है। जिसके परिणाम स्वरूप मन दूषित विचारों से भर जाता है। क्रोध से प्रथम तो उद्वेग उत्पन्न होता है। मन एक गुप्त किन्तु तीव्र पीड़ा से दग्ध होने लगत है। रक्त में गर्मी आ जाती है और उसका प्रवाह बड़ा तेज हो जाताहै।
इस गर्मी में मनुष्य के शुभ भाव, दया, प्रेम, सत्य, न्याय, विवेक ओर बुद्धि जल जाते हैं। क्रोध एक प्रकार का भूत है जिसके सवार होते ही मनुष्य आपे में नहीं रहता, उस पर किसी दूसरी सत्ता का प्रभाव हो जाता है। मन की निंद्य वृत्तियां उस पर अपन राक्षसी माया चढ़ा देती हैं, वह बिचारा इतना हत बुद्धि हो जाता है कि उसे यह ज्ञान नहीं रहता कि वह क्या कर रहा है। आधुनिक मनुष्य का आंतरिक जीवन और मानसिक अवस्था अत्यंत विक्षुब्ध है, दूसरों में वह अनिष्ट देखता है, उससे हानि होने की कुकल्पना में डूबा रहता है। जीवनपर्यंत इधर-उधर लुढ़कता, ठुकराया जाता रहता है, शोक दुख चिंताख्,अविश्वास, उद्वेग आदि विकारों के वशीभूत होकर रहता है।





