लखनऊ। हर साल देवशयनी एकादशी से चातुर्मास की शुरूआत होती है, क्योंकि इस दिन भगवान विष्णु चार माह के लिए योग निद्रा में चले जाते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान विष्णु योग निद्रा में होते हैं, तब विवाह, गृह प्रवेश, नामकरण समेत सभी प्रकार के शुभ कार्यों पर रोक लग जाती हैं। भगवान विष्णु के देवउठनी एकादशी पर जागने के बाद ही दोबारा शुभ कार्यों की शुरूआत होती है। मान्यता है कि इस दौरान महादेव पूरी सृष्टि का कार्यभार संभालते हैं। इसलिए चातुर्मास का समय पूजा-पाठ, जप, दान और सात्विक जीवन अपनाने के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। पंचांग के अनुसार, आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 24 जुलाई 2026 को सुबह 9 बजकर 12 मिनट से प्रारंभ होगी। 25 जुलाई 2026 को सुबह 11 बजकर 34 मिनट तक रहेगी। चूंकि 25 जुलाई को सूर्योदय के समय एकादशी तिथि रहेगी, इसलिए उदया तिथि के अनुसार इसी दिन देवशयनी एकादशी का व्रत रखा जाएगा और इसी दिन से चातुर्मास का आरंभ माना जाएगा।
भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं
साल 2026 में चातुर्मास का आरंभ 25 जुलाई से हो रहा है, जो 21 नवंबर तक चलेगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह पवित्र अवधि देवशयनी एकादशी से शुरू होकर देवउठनी एकादशी तक रहती है। इन चार महीनों को विशेष तप, साधना और भक्ति का समय माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि इस दौरान भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं, इसलिए विवाह, गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्य करने से परहेज किया जाता है। मान्यता है कि इस समय किए गए शुभ कार्यों के परिणाम अपेक्षाकृत कम मिलते हैं, लेकिन जप, तप, ध्यान और दान-पुण्य करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। चातुर्मास को आध्यात्मिक उन्नति का काल भी कहा जाता है। इस दौरान किए गए छोटे-छोटे उपाय और नियम व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, यदि इस अवधि में व्यक्ति अपनी राशि के अनुसार कुछ विशेष उपाय अपनाता है, तो इससे सुख, समृद्धि और मानसिक शांति प्राप्त हो सकती है।
शुभ मुहूर्त
ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 4:45 बजे से 5:29 बजे तक
अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 12:19 बजे से दोपहर 1:11 बजे तक
चातुमार्स: संयम, साधना और दान का काल
देवशयनी एकादशी से प्रारंभ होकर कार्तिक मास तक चलने वाले चातुर्मास को आत्मसंयम, भक्ति, तप, जप और दान का श्रेष्ठ काल माना जाता है। इस अवधि में विवाह, गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्यों को स्थगित कर दिया जाता है, क्योंकि इस दौरान भगवान विष्णु की अनुपस्थिति मानी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, चातुर्मास में सात्त्विक जीवन अपनाने तथा धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेने से आध्यात्मिक उन्नति के साथ-साथ जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है। इस चार माह की अवधि में संयम, साधना, सत्संग, सेवा और दान-पुण्य का विशेष महत्व बताया गया है। यह समय स्वयं को ईश्वर भक्ति में लीन करने और आध्यात्मिक विकास के लिए अत्यंत उपयुक्त है।
व्रत पारण का समय
ज्योतिषियों के अनुसार, देवशयनी एकादशी के व्रत का पारण 26 जुलाई को किया जाएगा। इस दिन व्रत सुबह 5:39 से 8:22 तक खोल सकते हैं।
चातुर्मास के बाद कब से शुरू होंगे विवाह?
साल 2026 में देवउठनी एकादशी 20 नवंबर 2026 को मनाई जाएगी। इस दिन विष्णु जी चार महीने की योग निद्रा से जागते हैं। इसी के साथ चातुर्मास खत्म होगा और विवाह के लिए शुभ मुहूर्त बनेंगे।
नवंबर 2026 विवाह के शुभ मुहूर्त
21 नवंबर 2026, शनिवार
24 नवंबर 2026, मंगलवार
25 नवंबर 2026, बुधवार
26 नवंबर 2026, बृहस्पतिवार
दिसंबर 2026 विवाह के शुभ मुहूर्त
2 दिसंबर 2026, बुधवार
3 दिसंबर 2026, बृहस्पतिवार
4 दिसंबर 2026, शुक्रवार
5 दिसंबर 2026, शनिवार
6 दिसंबर 2026, रविवार
11 दिसंबर 2026, शुक्रवार
12 दिसंबर 2026, शनिवार
एकादशी का महत्व
आषाढ़ मास के शुक्लपक्ष की एकादशी यानी देवशयनी एकादशी 25 जुलाई (शनिवार) को श्रद्धा के साथ मनाई जाएगी। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान श्रीहरि विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसी के साथ चातुर्मास शुरू हो जाता है। इस दौरान विवाह, गृह प्रवेश, जनेऊ, मुंडन समेत अन्य मांगलिक कार्यों पर विराम लग जाता है। चातुर्मास का समय जप, तप, दान, साधना और भगवान विष्णु व शिव की आराधना के लिए अत्यंत शुभ और फलदायी माना गया है।
भगवान शिव और सावन मास
ज्योतिषाचार्य ने बताया कि देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं जबकि सृष्टि के संचालन का दायित्व भगवान शिव संभालते हैं। इसी दौरान भगवान शिव का प्रिय सावन मास भी आता है।
शुभ योगों का संयोग
उन्होंने बताया कि इस वर्ष देवशयनी एकादशी पर ब्रह्म योग के बाद इंद्र योग, पुष्य नक्षत्र, सूर्य और उच्च के गुरु का दुर्लभ संयोग बन रहा है। ऐसे शुभ योगों में किए गए व्रत, पूजन, दान और धार्मिक अनुष्ठानों का फल कई गुना बढ़ जाता है। ज्योतिषाचार्य ने बताया कि आषाढ़ शुक्ल एकादशी तिथि 24 जुलाई को सुबह 9.12 बजे प्रारंभ होकर 25 जुलाई को सुबह 11.34 बजे समाप्त होगी। उदयातिथि के अनुसार व्रत 25 जुलाई को रखा जाएगा।
पूजा की विधि
ज्योतिषाचार्य ने बताया कि इस दिन भगवान विष्णु का दक्षिणावर्ती शंख में केसर मिश्रित दूध व गंगाजल से अभिषेक करना अत्यंत शुभ माना गया है। उन्हें पीले वस्त्र, पीले पुष्प और पीले फल अर्पित करने से सुख-समृद्धि और आर्थिक उन्नति का आशीर्वाद प्राप्त होता है। संध्या के समय तुलसी जी के पौधे के समक्ष गाय के घी का दीपक जलाकर, 11 परिक्रमा करनी चाहिए। उन्होंने बताया कि एकादशी के दिन सुबह पीपल के वृक्ष पर जल अर्पित कर शाम को दीपक जलाकर मनोकामना करने से भी शुभ फल की प्राप्ति होती है।





