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बशीर बद्र ने अवध का नाम रोशन किया : अब्दुल नसीर

शायर बशीर बद्र के निधन पर शोकसभा आयोजित
लखनऊ। प्रसिद्ध एवं प्रतिष्ठित शायर बशीर बद्र के निधन पर एक शोकसभा मुजाहिद-ए-उर्दू अब्दुल नसीर नासिर की अध्यक्षता में उनके आवास, विक्रमादित्य मार्ग, ईसाई कॉलोनी, हजरतगंज, लखनऊ में आयोजित की गई। सभा का संचालन मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी, लखनऊ कैंपस के डॉ. मसीहुद्दीन खान ने किया। शोकसभा में बेगम हजरत महल मेमोरियल सोसाइटी के सचिव अनवर आलम, डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ट्रस्ट के प्रवक्ता एवं वरिष्ठ पत्रकार मुजीबुर्रहमान सिद्दीकी, प्रदीप यादव (अधिवक्ता, हाईकोर्ट लखनऊ), कमला कांत गौतम (पूर्व वित्त मंत्री), रामचंद्र पटेल, छत्रपति शाहूजी महाराज मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष तथा पत्रकार अवनीश कुमार सहित अन्य गणमान्य लोगों ने अपने विचार व्यक्त किए। वक्ताओं ने कहा कि बशीर बद्र का लखनऊ और अवध से गहरा संबंध था। उनका जन्म जनपद फैजाबाद में हुआ था। उन्होंने उच्च शिक्षा के लिए अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में अध्ययन किया, इसके बाद मेरठ में नौकरी की तथा स्थायी निवास के लिए मध्य प्रदेश के भोपाल शहर को चुना। वक्ताओं ने कहा कि बशीर बद्र के निधन से उर्दू जगत में शोक की लहर दौड़ गई है और साहित्य जगत एक महान शायर से वंचित हो गया है। उन्होंने अपनी शायरी के माध्यम से समाज में नई चेतना और जागरूकता पैदा की। अध्यक्षीय संबोधन में अब्दुल नसीर नासिर ने कहा कि बशीर बद्र ने अवध का नाम रोशन किया और आज भी उनकी शायरी लोगों की जुबान पर है। उन्होंने बशीर बद्र का यह मशहूर शेर सुनाया-शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है, उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए। डॉ. मसीहुद्दीन खान ने कहा कि बशीर बद्र का निधन उर्दू शायरी के एक युग का अंत है। उन्होंने कहा कि बशीर बद्र को हमेशा याद रखा जाएगा। उनकी गजलों ने आम और खास सभी को अपना मुरीद बना लिया था। उनके अशआर पढ़ने वाला यह महसूस करता है कि मानो यह उसके अपने दिल की आवाज हो। ऐसी जनप्रियता प्राप्त करना अपने आप में बहुत बड़ा सम्मान है। इस अवसर पर मुजीबुर्रहमान सिद्दीकी ने बशीर बद्र के ये मशहूर अशआर पढ़े—यूँ ही दर-ब-दर न फेरा करो, कोई शाम घर भी रहा करो, वो गजल की सच्ची किताब है, उसे चुपके-चुपके पढ़ा करो। कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से, ये नए मिजाज का शहर है, यहाँ फासले से मिला करो। अनवर आलम ने कहा कि ऐसी लोकप्रिय और प्रभावशाली आवाज का खामोश हो जाना साहित्य जगत की बड़ी क्षति है, लेकिन मृत्यु एक अटल सत्य है। वक्ताओं ने बताया कि बशीर बद्र ने 91 वर्ष की आयु पाई और भोपाल में उनका निधन हुआ। कार्यक्रम के अंत में दिवंगत आत्मा की शांति एवं मगफिरत के लिए प्रार्थना की गई।

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