लखनऊ। सनातन धर्म में सावन का महीना और संकष्टी चतुर्थी का व्रत भगवान गणेश और शिवजी की कृपा पाने के लिए खास माना जाता है। इस बार अगस्त के महीने में पड़ने वाली सावन संकष्टी चतुर्थी कई मायनों में खास होने वाली है। दिक्र पंचांग के अनुसार इस दिन सर्वार्थ सिद्धि योग का दुर्लभ संयोग बन रहा है। धार्मिक मान्यता है कि इस योग में अगर सही विधि और सच्ची श्रद्धा के साथ पूजा की जाए तो सारी मनोकामनाएं पूरी हो सकती हैं। पंचांग के अनुसार इस साल सावन महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी की शुरूआत 1 अगस्त से हो जाएगी। तिथि के आरंभ होने का समय रात में 11:07 बजे है। वहीं इस तिथि का समापन अगले दिन यानी 2 अगस्त को होगा। तिथि के समापन का समय 11:15 बजे है। ऐसे में उदयातिथि और चंद्रोदय के टाइम को ध्यान में रखते हुए सावन संकष्टी चतुर्थी 2 अगस्त को मनाई जाएगी।
संकष्टी चतुर्थी पूजा का शुभ मुहूर्त
अगर आप सावन संकष्टी चतुर्थी का व्रत रख रहे हैं और भगवान गणेश जी की पूजा सही मुहूर्त में करना चाहते हैं तो सुबह 7:24 बजे से दोपहर 12:27 बजे तक का समय सबसे शुभ होगा। इसके अलावा भी पूजा के कई शुभ मुहूर्त रहेंगे। जो लोग बिजनेस में ग्रोथ चाहते हैं वो लोग सुबह 09:05 से 10:46 बजे तक पूजा करेंगे तो शुभ माना जाएगा। वहीं इस दिन अमृत मुहूर्त सुबह 10:46 से लेकर 12:27 बजे तक तक होगा सावन संकष्टी चतुर्थी की पूजा के लिए इसे सबसे शुभ माना जाता है। इसके अलावा ब्रह्म और अभिजीत मुहूर्त में भी इस दिन पूजा कर सकते हैं।
2 अगस्त का चंद्रोदय समय
द्रिक पंचांग के हिसाब से इस दिन चंद्रोदय का समय थोड़ा लेट होगा। चांद रात में 9:24 के आसपास निकलेगा। मान्यता है कि संकष्टी चतुर्थी की पूजा और व्रत चंद्रमा को अर्घ्य दिए बिना पूरा ही नहीं होता है।
सावन संकष्टी चतुर्थी की पूजा विधि
इस दिन सुबह स्नान करके साफ कपड़े पहन लें। भगवान गणेश की पूजा और व्रत के लिए संकल्प लें। शाम में पूजा घर में चौकी पर लाल वस्त्र बिछा लें। यहां पर गणेश भगवान की मूर्ति या फिर तस्वीर की स्थापना करें। दीया और धूप जलाएं। गणेश जी को रोली-चंदन का तिलक करें। फूल अर्पित करें। मोदक या फिर लड्डू का भोग लगाएं। इस पूजा में दुर्वा अर्पित करना ना भूलें। पूजा के बाद आप संकष्टी चतुर्थी की कथा पढ़ लें और आरती करें। इसके बाद रात में जब चंद्रमा निकलें तो लोटे में जल लें। इसमें थोड़ा सा दूध, अक्षत और फूल मिलाएं। इससे चंद्रमा को अर्घ्य दें। प्रसाद ग्रहण करके व्रत खोलें और लोगों को भी दें।





