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कच्चाथीवू द्वीप कहां है और इंदिरा गाँधी ने श्रीलंका को क्यों दिया

कच्चाथीवू द्वीप 14वीं शताब्दी में एक ज्वालामुखी विस्फोट के बाद बना था। भारत के तमिलनाडु और श्रीलंका के बीच काफी बड़ा समुद्री क्षेत्र है। इस समुद्री क्षेत्र को पाक जलडमरूमध्य कहा जाता है। यहां कई सारे द्वीप हैं, जिसमें से एक द्वीप का नाम कच्चाथीवू है। सूत्रों के मुताबिक कच्चाथीवू 285 एकड़ में फैला एक द्वीप है। ये द्वीप बंगाल की खाड़ी और अरब सागर को जोड़ता है। रामेश्वरम से करीब 19 किलोमीटर और श्रीलंका के जाफना जिले से करीब 16 किलोमीटर की दूरी पर है। रॉबर्ट पाक 1755 से 1763 तक मद्रास प्रांत के अंग्रेज गवर्नर हुआ करते थे। इस समुद्री क्षेत्र का नाम रॉबर्ट पाक के नाम पर ही पाक स्ट्रेट रखा गया।

एक समय तक यह इलाका रामनाद साम्राज्य का हिस्सा था।

17वीं सदी में रघुनाथ देव किलावन ने खुद को रामनाद साम्राज्य का राजा घोषित कर दिया। इसके बाद कच्चाथीवू द्वीप पर उनका राज हो गया। 1902 में भारत की ब्रिटिश हुकूमत ने इस द्वीप पर शासन का अधिकार रामनाद या रामनाथपुरम साम्राज्य के राजा को दिया। रामनाथपुरम के राजा यहां के लोगों से मालगुजारी वसूलते थे। वो अंग्रेज अधिकारी को इसके बदले में एक खास रकम देते थे। 1913 में भारत सरकार के सचिव और रामनाथपुरम के राजा के बीच एक समझौता हुआ था। इस समझौते के मुताबिक कच्चाथीवू को श्रीलंका के बजाय भारत का हिस्सा बताया गया है।

कच्चाथीवू द्वीप को लेकर भारत सरकार एवं श्रीलंका के बीच पहली   बार टकराव

1921 में पहली बार इस क्षेत्र को लेकर भारत और श्रीलंका के बीच विवाद हुआ। उस समय ये द्वीप अंग्रेजों के अधीन था। अंग्रेजों ने इस विवाद पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। इसकी वजह से ये विवाद बढ़ता चला गया। इससे पहले दोनों देशों के मछुआरे इस द्वीप को जाल सुखाने के लिए इस्तेमाल करते थे।

1974 से 1976 के बीच उस समय की भारतीय इंदिरा गांधी और श्रीलंका की ढट श्रीमाव भंडारनायके ने चार समुद्री जल समझौतों पर दस्तखत किए। इसके तहत भारत ने इस द्वीप को श्रीलंका को सौंप दिया। तब से श्रीलंका इस द्वीप पर कानूनी तौर पर अपना दावा ठोकता है। जब भारत सरकार ने इस द्वीप को लेकर श्रीलंका के साथ समझौता किया था तो तमिलनाडु सरकार ने इसका विरोध किया था। तब तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि ने ढट इंदिरा गांधी को पत्र लिखकर कहा था कि ये द्वीप ऐतिहासिक रूप से रामनाद साम्राज्य की जमींदारी का हिस्सा है।
समझौते के तहत भारतीय मछुआरों को यहां मछली मारने और जाल सुखाने की इजाजत दी गई थी। इसी वजह से भारतीय मछुआरे वहां जाते रहते थे, लेकिन 2009 के बाद श्रीलंका नौसेना वहां जाने वाले भारतीय मछुआरों को गिरफ्तार करने लगी। मछली पकड़ने के लिए इस द्वीप तक आसानी से पहुंचते थे। 2008 में जयललिता ने 1974 और 1976 के बीच हुए कच्चाथीवू द्वीप समझौतों को रद्द करने के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। 2009 में श्रीलंका की सरकार और लिट्टे के बीच की लड़ाई लगभग खत्म होने वाली थी। लिट्टे संगठन कमजोर हो रहा था। ऐसे में श्रीलंका सरकार ने अपनी सीमाओं पर सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत कर दिया। जब भी तमिलनाडु के मछुआरे मछली मारने के लिए इस द्वीप के करीब जाते थे, श्रीलंका की पुलिस उन्हें गिरफ्तार कर लेती थी।

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