सौंदर्य एवं सांस्कृतिक विकास कार्यक्रम 2026-27 के अंतर्गत राकु एवं टेराकोटा पॉटरी कार्यशाला का समापन समारोह
लखनऊ। फ्लोरसेंस आर्ट गैलरी और लखनऊ पब्लिक स्कूल एंड कॉलेजेस के संयुक्त तत्वाधान में सौंदर्य एवं सांस्कृतिक विकास कार्यक्रम 2026-27 के अंतर्गत आयोजित राकु एवं टेराकोटा पॉटरी के नौ दिवसीय कार्यशाला का समापन समारोह शुक्रवार को लखनऊ पब्लिक स्कूल गोमती नगर ब्रांच विद्यालय समुदाय में पारंपरिक शिल्प, अनुभवात्मक शिक्षण और सामूहिक कलात्मक सहभागिता के एक महत्त्वपूर्ण उत्सव के रूप में संपन्न हुआ। यह आयोजन विद्यार्थियों, अभिभावकों, शिक्षकों एवं कलाकारों के बीच कला-संवाद, रचनात्मक प्रयोग और सांस्कृतिक चेतना का सशक्त माध्यम बनकर उभरा। लखनऊ के युवा मूर्तिकार, सिरैमिक एवं टेराकोटा कलाकार प्रेम शंकर प्रसाद के निर्देशन में आयोजित इस नौ दिवसीय कार्यशाला ने विद्यार्थियों को राकु फायरिंग एवं टेराकोटा पॉटरी की समृद्ध दृश्य एवं शिल्प परंपराओं से परिचित कराया। प्रक्रिया-आधारित शिक्षण के माध्यम से विद्यार्थियों ने मिट्टी को एक संवेदनशील माध्यम के रूप में अनुभव करते हुए पारंपरिक तकनीकों, सतही प्रयोगों, भट्ठी प्रक्रिया तथा भारतीय मृद्शिल्प परंपराओं की सांस्कृतिक विरासत को समझा। कार्यशाला ने विद्यार्थियों को कच्ची मिट्टी के अभिव्यक्तिपूर्ण कलात्मक रूपों में रूपांतरण की सृजनात्मक यात्रा का अनुभव कराया।
प्रधानाचार्या अनीता चौधरी ने अपने वक्तव्य में समग्र विकास में सौंदर्यपरक शिक्षा की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह कार्यशाला विद्यार्थियों में अवलोकन क्षमता, रचनात्मकता एवं सजग सहभागिता विकसित करने का एक महत्त्वपूर्ण माध्यम रही। उन्होंने शिक्षकों, अभिभावकों एवं कलाकारों की सक्रिय सहभागिता की भी सराहना की, जिन्होंने मिलकर एक जीवंत शिक्षण वातावरण का निर्माण किया। इस अवसर पर निदेशिका नेहा सिंह ने मुख्यधारा की शिक्षा में कला-शिक्षण के समावेशन की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि कार्यशाला को आई डू, वी डू, यू डू पद्धति के आधार पर संरचित किया गया, जिससे विद्यार्थियों को प्रदर्शन, सामूहिक अभ्यास एवं स्वतंत्र अन्वेषण के माध्यम से सीखने का अवसर मिला। इस प्रक्रिया ने विद्यार्थियों में आत्मविश्वास, आलोचनात्मक चिंतन एवं सक्रिय सहभागिता को प्रोत्साहित किया।
समापन समारोह के मुख्य अतिथि भूपेन्द्र कुमार अस्थाना ने विद्यालय द्वारा पारंपरिक कलाओं को समकालीन शिक्षा से जोड़ने के प्रयासों की सराहना की। अपने वक्तव्य में उन्होंने कहा कि सिरामिक कला केवल मिट्टी को आकार देने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि संवेदनाओं, धैर्य, सृजनात्मकता और जीवन-दृष्टि को अभिव्यक्त करने का माध्यम है। मिट्टी का एक साधारण सा लोथड़ा जब कलाकार के स्पर्श, कल्पना और तकनीक से गुजरता है, तब वह केवल एक वस्तु नहीं रहता, बल्कि संस्कृति, सौंदर्य और मानवीय अनुभव का जीवंत दस्तावेज बन जाता है। उन्होंने कहा कि यह कार्यशाला केवल तकनीकी प्रशिक्षण का मंच नहीं, बल्कि संवाद, प्रयोग और आत्म-अभिव्यक्ति का एक रचनात्मक अवसर है। सिरामिक कला हमें प्रकृति के अत्यंत निकट ले जाती है — मिट्टी, जल, अग्नि और वायु जैसे पंचतत्वों के समन्वय से निर्मित यह कला भारतीय परंपरा, लोक जीवन और समकालीन संवेदनाओं को एक साथ जोड़ती है। उन्होंने आगे कहा कि आज आवश्यकता इस बात की है कि पारंपरिक कलाओं को केवल विरासत के रूप में न देखा जाए, बल्कि उन्हें समकालीन संदर्भों में नए प्रयोगों, नवाचारों और युवा सहभागिता के माध्यम से आगे बढ़ाया जाए। ऐसी कार्यशालाएँ कलाकारों के संवर्धन, विलुप्त होती शिल्प परंपराओं के संरक्षण तथा कला के दस्तावेजीकरण में अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। अंत में उन्होंने आयोजन से जुड़े सभी आयोजकों, प्रशिक्षकों और प्रतिभागियों को शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि यह कार्यशाला सभी के भीतर नई ऊर्जा, नई दृष्टि और सृजन के प्रति गहरी संवेदनशीलता का संचार करेगी। कला विभागाध्यक्ष राजेश कुमार ने बताया कि कार्यशाला का संयोजन कला शिक्षकों भाव्या एवं समर द्वारा किया गया, जिनके सतत मार्गदर्शन ने विद्यार्थियों को पूरी सृजनात्मक प्रक्रिया के दौरान प्रेरित एवं सहयोग प्रदान किया। उनके निर्देशन ने पारंपरिक शिल्प-कौशल और समकालीन कक्षा-शिक्षण के बीच एक सार्थक सेतु का कार्य किया। कार्यक्रम का एक विशेष एवं भावनात्मक पक्ष अभिभावकों की सक्रिय सहभागिता रही, जिन्होंने अपने बच्चों के साथ मिलकर कार्यशाला में भाग लिया। इस सहभागिता ने पीढ़ियों के मध्य संवाद को सशक्त किया तथा कला के माध्यम से सामूहिक सीखने के अनुभव को और समृद्ध बनाया। कार्यशाला का वातावरण एक साझा सांस्कृतिक परिसर में परिवर्तित हो गया, जहाँ अवलोकन, सृजन और आत्मचिंतन स्वाभाविक रूप से विकसित होते रहे। समारोह के दौरान विद्यार्थियों ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि इस कार्यशाला ने उन्हें पारंपरिक मृद्शिल्प तकनीकों को समझने के साथ-साथ धैर्य, एकाग्रता एवं सृजनात्मक स्वतंत्रता का अनुभव भी कराया। कार्यक्रम का समापन विद्यार्थियों द्वारा निर्मित पॉटरी कलाकृतियों की प्रदर्शनी के साथ हुआ, जिसमें विविध आकारों, सतही बनावटों एवं राकु फायरिंग से विकसित कलात्मक परिणामों को प्रदर्शित किया गया। अंत में प्रतिभागी विद्यार्थियों को प्रमाण-पत्र प्रदान किए गए तथा कलाकार, अतिथियों, शिक्षकों, अभिभावकों एवं सभी सहभागियों के प्रति औपचारिक धन्यवाद ज्ञापित किया गया, जिनके सहयोग से यह कार्यशाला एक सार्थक कलात्मक एवं शैक्षिक पहल के रूप में सफलतापूर्वक संपन्न हुई।





