मंच से गूंजी पुकार—मूर्ति नहीं, विचार बनो
लखनऊ। उत्तर प्रदेश संस्कृति विभाग के सहयोग से रंगमंडल स्वर इंडिया एसोसिएशन, लखनऊ द्वारा राय उमानाथ बली प्रेक्षागृह, केसरबाग में प्रस्तुत नाटक मैं कृष्ण हूँ ने दर्शकों को केवल एक रंगमंचीय अनुभव ही नहीं दिया, बल्कि आत्ममंथन और सामाजिक चेतना का एक सशक्त संदेश भी प्रदान किया। वरिष्ठ रंगकर्मी चंद्रभाष सिंह द्वारा लिखित एवं निर्देशित इस नाटक ने श्रीकृष्ण के जीवन को चमत्कारों और दैवीय आभा से अलग कर उनके संघर्ष, त्याग, कर्तव्य और मानवीय मूल्यों के दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया। नाटक की शुरूआत कृष्ण के आत्मसंवाद से होती है, जहाँ वे मानव समाज से प्रश्न करते हैं कि उसने उन्हें पूजा और आस्था का विषय तो बना लिया, लेकिन उनके जीवन-संघर्षों और आदर्शों को क्यों भुला दिया। यह प्रश्न पूरे नाटक की आत्मा बनकर दर्शकों के मन में लगातार गूंजता रहा। कथा कंस के अत्याचार, देवकी-वसुदेव के कारावास और भय तथा अन्याय से घिरे समय में कृष्ण के जन्म से आगे बढ़ती है। गोकुल की बाल-लीलाओं से लेकर धर्म और न्याय की स्थापना के लिए किए गए उनके संघर्षों को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से मंचित किया गया। राधा और कृष्ण के संबंधों को भी प्रेम की पारंपरिक परिभाषाओं से ऊपर उठाकर त्याग, समर्पण और आत्मिक एकत्व के रूप में प्रस्तुत किया गया, जिसने दर्शकों को भावुक कर दिया। नाटक का सबसे सशक्त पक्ष यह रहा कि इसमें कृष्ण को किसी अलौकिक शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि ऐसे व्यक्तित्व के रूप में चित्रित किया गया जो विपरीत परिस्थितियों में भी सत्य और धर्म के मार्ग पर अडिग रहा। महाभारत के प्रसंगों और गांधारी के श्राप को स्वीकार करने वाले दृश्य ने यह संदेश दिया कि न्याय और सत्य के लिए संघर्ष करने वालों को अनेक बार पीड़ा और विरोध भी सहना पड़ता है, लेकिन इतिहास उन्हीं के पक्ष में खड़ा होता है। प्रस्तुति का चरम दृश्य तब आया जब कृष्ण ने मंच से सीधे दर्शकों को संबोधित करते हुए कहा कि समाज को पत्थर की मूर्तियों से अधिक ऐसे मनुष्यों की आवश्यकता है, जो अन्याय, भ्रष्टाचार और असत्य के विरुद्ध साहसपूर्वक खड़े हो सकें। यह संवाद पूरे सभागार में देर तक गूंजता रहा और दर्शकों को गहरे चिंतन के लिए विवश कर गया। नाटक में जूही कुमारी, नीलम कुमारी, लावण्या बाजपेई, लता बाजपेई, शालू तिवारी, वीना सहगल, हर्षिता श्रीवास्तव, वैष्णवी श्रीवास्तव, मुकुल कुमार, उज्ज्वल सिंह, कृष्ण कुमार पांडेय, प्रेम कुमार, उन्नत बहादुर सिंह, अजय सिंह, अभिषेक कुमार, आनंद तिवारी, अनूप जायसवाल तथा तरुण बाजपेई ने अपने सशक्त और जीवंत अभिनय से पात्रों को प्रभावशाली रूप दिया। वहीं अनन्या अग्रवाल, अनन्या वर्मा एवं निवेदिता बनर्जी के मनोहारी नृत्य ने प्रस्तुति को और अधिक आकर्षक बना दिया। नृत्य निर्देशन डॉ. उपासना दीक्षित द्वारा किया गया। प्रस्तुति के समापन पर दर्शकों ने देर तक तालियाँ बजाकर कलाकारों का उत्साहवर्धन किया। मैं कृष्ण हूँ केवल एक नाटक नहीं, बल्कि वर्तमान समाज के लिए एक वैचारिक हस्तक्षेप और आत्ममंथन का आमंत्रण सिद्ध हुआ, जिसने यह संदेश दिया कि कृष्ण मंदिरों में नहीं, बल्कि सत्य, साहस और मानवता के पक्ष में खड़े होने वाले प्रत्येक व्यक्ति के भीतर जीवित हैं।





