मशहूर शायर पद्मश्री बशीर बद्र का निधन, साहित्यिक जगत में शोक की लहर
लखनऊ। उजाले अपनी यादों को हमारे पास रहने दो, ना जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए, ऐसी कई कालजयी रचनाओं के जरिए देश- दुनिया में छाने वाले मशहूर शायर पद्मश्री बशीर बद्र ने 91 वर्ष की उम्र में इस दुनिया को अलविदा कह दिया। उनका पैतृक घर अंबेडकरनगर जिले के बसखारी ब्लाक के बुकिया गांव में था। हालांकि, पैतृक गांव से उनके पिता का नाता दशकों पहले टूट चुका था। उनके निधन की खबर से जिले के साहित्यिक जगत में शोक की लहर है। उन्होंने अपनी शायरी के जरिए देश ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग पहचान बनाई। अपनी सरल, संवेदनशील और दिल को छू लेने वाली गजलें व शेरों के कारण लोग के बीच बेहद लोकप्रिय रहे। रुद्रपुर भगाही आबिद हुसैन बशीर बद्र से कई बार मिल चुके हैं। वे बताते हैं कि उनका असली नाम सैयद मोहम्मद बशीर था। 15 फरवरी 1935 में कानपुर में पैदा हुए। पिता सैयद मोहम्मद नजीर पुलिस विभाग में नौकरी कर रहे थे। कक्षा तीन तक कानपुर में पढ़ाई हलीम मुस्लिम कालेज में की थी। उसके बाद पिता का तबादला इटावा हो गया था। मोहम्मद सिद्दीक इस्लामिया कालेज से हाईस्कूल करने के दौरान वालिद का इंतकाल हो गया। इससे शिक्षा का क्रम टूट गया। बशीर बद्र ने 85 रुपये मासिक वेतन पर पुलिस विभाग में नौकरी कर ली। रिश्ता चचेरी बहन कमर जहां से हुआ था। नियाज फतेहपुरी की पत्रिका निगार में इनके लेख छपने लगे। 1967 में पुलिस की नौकरी छोड़ दी। यूनिवर्सिटी के वजीफे और मुशायरा की आमदनी से घर चलता रहा। 1974 में पीएचडी की और अस्थाई रूप से अलीगढ़ में पढ़ाने लगे। इसके बाद नियुक्ति मेरठ यूनिवर्सिटी में हो गई । वर्ष 1984 में बीवी का इंतकाल हो गया। 1987 में मेरठ के फसाद में घर लूट लिया गया। 1986 में भोपाल की डाक्टर राहत सुल्ताना से शादी कर ली और वही स्थाई रूप से बस गए। जिले के मशहूर शायर डा. हसन सईद जलालपुरी, मसहद जलालपुरी व शहकार जलालपुरी ने शायर बशीर बद्र के निधन को साहित्य जगत के लिए अपूर्णीय क्षति बताया है। उन्होंने कहा आज जब डॉ. बशीर बद्र शारीरिक रूप से हमारे बीच विद्यमान नहीं हैं, तब ऐसा शिद्दत से महसूस होता है कि उर्दू अदब का एक बेहद नरम, बेहद आत्मीय और मानवीय अध्याय हमेशा के लिए समाप्त हो गया। लेकिन सच्चे और महान रचनाकार कभी मरा नहीं करते। वे लोगों की रोजमर्रा की बातचीत में, प्रेमियों के अकेलेपन में, महबूब की यादों में, और इंसानियत की साझी स्मृतियों में हमेशा-हमेशा के लिए जिंदा रहते हैं।
उर्दू अदब के एक युग का अवसान
कथाकार अखिलेश कहते हैं कि उर्दू शायरी की मखमली दुनिया में कुछ आवाजें ऐसी होती हैं जो सिर्फ कानों से होकर नहीं गुजरतीं, बल्कि रूह में उतरकर इंसानी जिंदगी का लाजमी हिस्सा बन जाती हैं। पद्मश्री डॉ. बशीर बद्र एक ऐसी ही जादुई और मुकम्मल आवाज थे। अब जब यह मर्मांतक खबर आई है कि बशीर बद्र हमारे बीच नहीं रहे, तो ऐसा महसूस होता है जैसे गजल की महफिल का सबसे सुकोमल, सबसे रौशन और सबसे शफ्फाक दिया बुझ गया हो। 91 वर्ष की सुदीर्घ आयु में सांस्कृतिक नगरी भोपाल में उनका निधन हुआ। वे लंबे समय से अस्वस्थता से जूझ रहे थे, लेकिन उनका खामोश होना भी उर्दू अदब के एक युग के अवसान जैसा है।
आम आदमी के दिल की धड़कन
बशीर बद्र की शायरी की सबसे बड़ी और अप्रतिम ताकत यह थी कि वह भारी-भरकम किताबों की अलमारियों और अकादमिक बंदिशों से आजाद होकर सीधे आम आदमी के दिल में धड़कन बनकर उतर जाती थी। उनकी गजलें न केवल महबूब से गुफ्तगू करती थीं, बल्कि वे समकालीन समाज, मानवीय रिश्तों के ताने-बाने, शहरी तन्हाई, अंदरूनी टूटन और सार्वभौमिक इंसानी मोहब्बत की मुकम्मल दास्तान भी बयां करती थीं। वे उन विरल और चुनिंदा शायरों में शुमार थे जिनके शेर मुशायरों के मंचों से निकलकर देश की संसद तक गूंजे, और प्रेमपत्रों की सुगंध से लेकर आधुनिक सोशल मीडिया की डिजिटल वॉल तक, हर वर्ग के लोगों की जुबान पर चढ़ गए। उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए। यह केवल दो पंक्तियों का कोई शेर नहीं है, बल्कि यह मानव जीवन की शाश्वत नश्वरता, उसकी अनिश्चितता और स्मृतियों की जीवनदायिनी गरमाहट का एक दार्शनिक और आत्मीय बयान है। इसी तरह बदलते सामाजिक सरोकारों और महानगरीय अजनबीयत पर चोट करता उनका यह शेर आज के इस दौर में और अधिक मार्मिक तथा प्रासंगिक लगता है:
भाषा का सरलीकरण और अकादमिक अवदान
डॉ. बशीर बद्र की युगांतरकारी खासियत यह थी कि उन्होंने उर्दू गजल को ह्यमुश्किल और क्लिष्ट अल्फाजोंह्ण की पारंपरिक कैद से पूरी तरह आजाद किया और उसे रोजमर्रा की आमफहम जिंदगी और संवाद से जोड़ दिया। उनकी काव्य-भाषा में न तो मीर तकी मीर की वह गहरी और बोझिल उदासी थी जो अवसाद की ओर ले जाए, और न ही मिर्ज़ा गालिब की वह दार्शनिक जटिलता थी जिसे समझने के लिए शब्दकोशों की जरूरत पड़े। उनके यहाँ एक सहज, पारदर्शी और बेहद आत्मीय मानवीय स्पर्श था। वे जीवन के सबसे गहरे दर्द को भी बड़ी नजाकत से कहते थे, मगर उसमें कहीं भी बिखरने या टूटने का अहसास नहीं होता था। वे शिद्दत से मोहब्बत लिखते थे, लेकिन उस मोहब्बत में हवाई कल्पनाएं नहीं, बल्कि जीवन का कड़वा और ठोस यथार्थ भी पूरी तरह शामिल रहता था। उनकी निजी जिंदगी भी उतार-चढ़ाव से भरी किसी महाकाव्यात्मक गजल से कम नहीं रही। उत्तर प्रदेश के अयोध्या (फैजाबाद) जिले में जन्मे बशीर बद्र ने शिक्षा के प्रतिष्ठित केंद्र अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से बीए, एमए और पीएचडी की डिग्रियां हासिल कीं। अकादमिक क्षेत्र में उनका अवदान अत्यंत समृद्ध रहा। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य किया और बाद में मेरठ कॉलेज में उर्दू विभागाध्यक्ष के रूप में अपनी दीर्घ सेवाएं दीं। उनके शोध कार्यों और आलोचनात्मक दृष्टि को साहित्यिक जगत में अत्यंत सम्मान से देखा गया।
भोपाल को अपना स्थायी बसेरा बना लिया
वर्ष 1987 के मेरठ दंगों के दौरान बशीर साहब पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। सांप्रदायिक हिंसा की आग में उनका हंसता-खेलता घर, उनकी अमूल्य निजी लाइब्रेरी और वर्षों की अनथक मेहनत से तैयार किया गया बहुत सा अप्रकाशित साहित्यिक कार्य (पांडुलिपियां) जलकर खाक हो गया। यह विदारक हादसा उनकी रूह पर एक कभी न भरने वाला गहरा जख्म बनकर रह गया। इस आत्मिक और भौतिक क्षति के बाद उन्होंने मेरठ छोड़ दिया और झीलों की नगरी भोपाल को अपना स्थायी बसेरा बना लिया। लेकिन इस भयानक त्रासदी की आंच ने उनके भीतर नफरत पैदा नहीं की, बल्कि उनकी शायरी में इंसानियत, अमन और भाईचारे का स्वर और अधिक बुलंद व गहरा होता चला गया। इसी मानवीय गरिमा और सह-अस्तित्व की भावना को रेखांकित करता उनका यह कालजयी शेर भारत-पाक संबंधों से लेकर हमारे आपसी सामाजिक रिश्तों तक पर हुबहू लागू होता है। डॉ. बशीर बद्र की कालजयी शायरी आने वाली अनगिनत पीढ़ियों को हमेशा यह याद दिलाती रहेगी कि शब्द सिर्फ कोरे अल्फाज या अक्षरों के समूह नहीं होते, बल्कि वे संकट के समय में तड़पती हुई इंसानियत की आखिरी पनाहगाह और उम्मीद की किरण भी हो सकते हैं। गजल के इस महान चिराग को भावभीनी श्रद्धांजलि।





