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रुद्र शंकर मिश्रा ने कथक की मनमोहक प्रस्तुति से समां बांधा

लखनऊ। भातखण्डे संस्कृति विश्वविद्यालय, लखनऊ के तत्वावधान में आज विश्वविद्यालय के कला मण्डपम सभागार में एक भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अवसर पर संगीत नाटक अकादमी के उस्ताद बिस्मिल्लाह खान युवा पुरस्कार से सम्मानित एवं दूरदर्शन के ग्रेडेड कलाकार पंडित रुद्र शंकर मिश्रा द्वारा कथक नृत्य की प्रभावशाली प्रस्तुति दी गई। कार्यक्रम का शुभारंभ विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. मांडवी सिंह, कार्य परिषद सदस्य प्रो. मंजुला चतुर्वेदी पंडित रुद्र शंकर मिश्रा एवं डॉ. हेमचंद्र पालीवाल द्वारा संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलन कर किया गया। कार्यक्रम विश्वविद्यालय के शताब्दी वर्ष समारोह के अंतर्गत आयोजित किया गया। पंडित रुद्र शंकर मिश्रा ने अपनी प्रस्तुति का शुभारंभ शिव तांडव से करते हुए तीनताल में उपज एवं तिहाई की मनोहारी प्रस्तुति दी। उनकी प्रस्तुति में भाव, गति एवं ताल का अद्वितीय समन्वय देखने को मिला, जिसने उपस्थित दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। विशेष रूप से उनके अभिनव पद संचालन, सशक्त तत्कार तथा प्रभावपूर्ण भावाभिनय ने विद्यार्थियों एवं दर्शकों की भरपूर सराहना अर्जित की।
समापन प्रस्तुति में राघवेन्द्र शर्मा द्वारा रचित एवं स्वरबद्ध गीत झूला लागे रे लागे आनंद वन मा पर कथक नृत्य प्रस्तुत किया गया, जिसने कार्यक्रम को एक भावपूर्ण एवं मधुर परिणति प्रदान की। कार्यक्रम के समापन पर उन्होंने विद्यार्थियों के साथ संवाद करते हुए उनके अनेक जिज्ञासापूर्ण प्रश्नों का सहज एवं सारगर्भित उत्तर दिया, जिससे विद्यार्थियों को कथक की बारीकियों को समझने का महत्वपूर्ण अवसर प्राप्त हुआ। इस प्रस्तुति में तबले पर उदय शंकर मिश्रा द्वारा उत्कृष्ट संगत दी गई, जबकि गायन में राघवेन्द्र शर्मा की मधुर स्वर लहरियों ने कार्यक्रम को और भी समृद्ध बना दिया।
पंडित रुद्र शंकर मिश्रा बनारस के प्रसिद्ध प्रिया बंधु जोड़ी के प्रख्यात कथक नर्तक पंडित माता प्रसाद मिश्रा के सुपुत्र एवं पंडित रवि शंकर मिश्रा के भतीजे व शिष्य हैं। उन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय से कथक नृत्य में स्नातकोत्तर तथा पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त कर रहे है। वे आचार्य सुखदेव महाराज की बनारस घराने की परंपरा से जुड़े हुए हैं। विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. मांडवी सिंह ने कहा कि इस प्रकार के सांस्कृतिक आयोजन भारतीय शास्त्रीय कलाओं के संरक्षण एवं संवर्धन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। विद्यार्थियों को अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से जोड़ना समय की आवश्यकता है। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे महान कलाकारों से विद्यार्थियों को सीखने की प्रेरणा लेनी चाहिए, जिससे वे अपनी कला को और अधिक निखार सकें। विश्वविद्यालय के कुलसचिव एस. पी. सिंह ने बताया कि विश्वविद्यालय के शताब्दी वर्ष में इस प्रकार के संयुक्त आयोजन विद्यार्थियों को श्रेष्ठ कलाकारों से सीधे जुड़ने का अवसर प्रदान करते हैं, जिससे उनकी कला के प्रति समझ और अधिक गहरी होती है। विश्वविद्यालय द्वारा समय-समय पर इस प्रकार के आयोजनों के माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का कार्य निरंतर किया जा रहा है।
इस अवसर विश्वविद्यालय के गायन विभागाध्यक्ष प्रो. सृष्टि माथुर, तालवाद्य विभागाध्यक्ष डॉ. मनोज कुमार मिश्रा, नृत्य विभागाध्यक्ष श्री ज्ञानेंद्र दत्त बाजपेयी, सहायक आचार्य (कथक) श्रीमती मंजुला पंत एवं सहायक आचार्य (नृत्य) डॉ. रुचि खरे समेत विश्वविद्यालय के अन्य शिक्षक, संगतकर्ता, विद्यार्थी एवं शोधार्थी उपस्थित रहे।

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