इस किताब की मजबूत बात उसकी ईमानदारी है
लखनऊ। कुछ किताबें ऐसी होती हैं, जिन्हें पढ़ते हुए लगता है कि हम किताब के नहीं, बल्कि जिंदगी के पन्ने पलट रहे हैं। पंडित मल्लिकार्जुन मंसूर की ‘रसयात्रा’ ऐसी ही किताब है। यह सिर्फ एक मशहूर शास्त्रीय गायक की आत्मकथा नहीं है। यह उस आदमी की कहानी है जिसने संगीत को पेशे की तरह नहीं, जीवन की तरह जिया। किताब में उनका बचपन, थिएटर के दिन, गुरुओं की डांट और प्यार भी है। कभी रियाज की बातें होती हैं तो कभी महफिलों की चमक है। किताब खुद को बहुत बड़ा बनाकर पेश नहीं करती। मंसूर साहब कहीं भी अपने बारे में भारी बातें नहीं करते। कई जगह तो ऐसा लगता है जैसे कोई बुजुर्ग कलाकार शाम को आराम से बैठकर अपनी जिंदगी के किस्से सुना रहा है। सबसे अच्छी बात ये है कि वे प्रयोग से डरते नहीं हैं। इस किताब की मजबूत बात उसकी ईमानदारी है। आजकल कलाकारों की आत्मकथाओं में अक्सर अपने संघर्ष को भी चमकदार अंदाज में दिखाया जाता है, लेकिन यहां वैसा कुछ नहीं है। मंसूर साहब अपनी गलतियां भी बताते हैं, अपनी सीमाएं भी और अपने डर भी। एक जगह वे लिखते हैं कि कैसे किसी कठिन राग की मींड वे बार-बार समझाने की कोशिश कर रहे थे और सामने वाला पकड़ ही नहीं पा रहा था। दूसरी जगह वे खुद अपने गुरुओं के सामने असहाय शिष्य की तरह दिखाई देते हैं। उनकी यह विनम्रता किताब के लगभग हर पन्ने पर दर्ज है। उनके लिए संगीत सचमुच पूजा जैसा था। यह उनके व्यवहार में भी दिखता है। चाहे सामने दस लोग बैठे हों या बहुत बड़ी महफिल, वे उसी गंभीरता से गाते थे। किताब पढ़ते हुए हमें जिंदगी के कई बड़े सबक भी मिलते हैं। किताब के कुछ हिस्से ऐसे हैं, जो देर तक दिमाग में घूमते रहते हैं। बसवकल्याण वाला हिस्सा तो अंतर्मन की गहराइयों में दर्ज हो जाता है। वहां मंच के सामने संगीत समझने वाले लोग नहीं थे। किसान थे, बच्चे थे, महिलाएं थीं, आसपास शोर था। मंसूर साहब के बेटे को लगा कि यहां शास्त्रीय संगीत कौन सुनेगा। लेकिन वे बिना परेशान हुए तानपुरा साधते हैं और पूरे मन से राग यमन गाना शुरू कर देते हैं। थोड़ी देर बाद शोर कम होने लगता है। यह पढ़ते हुए समझ आता है कि असली कलाकार श्रोता की हैसियत देखकर अपना स्तर तय नहीं करता। एक और बेहद खूबसूरत हिस्सा वह है, जब कुमार गंधर्व सामने बैठे हैं और मंसूर साहब बसंती केदार गा रहे हैं। उस समय ऐसा लगता है, जैसे दो कलाकार शब्दों से नहीं, रागों से बातचीत कर रहे हों। एक गा रहा है और दूसरा सिर्फ दाद नहीं दे रहा, बल्कि भीतर से सुन रहा है। किताब को पढ़ते हुए बार-बार महसूस होता है कि पुराने समय का संगीत सीखना कितना कठिन रहा होगा। आज की तरह जल्दी मंच पर पहुंचने की बेचैनी नहीं थी। एक स्वर पर महीनों मेहनत करना, एक तान को बार-बार दोहराना, राग के भीतर छोटे-छोटे फर्क समझना, यह सब पढ़कर हैरानी भी होती है और सम्मान भी जागता है। किताब का वह हिस्सा भी बहुत असरदार है, जहां वे कहते हैं कि संगीत में कोई शॉर्टकट नहीं होता। यह बात साधारण लग सकती है, लेकिन किताब पढ़ने के बाद इसका वजन समझ में आता है। इस किताब की भाषा इसकी सबसे बड़ी ताकत है। इसमें भारी साहित्यिक दिखावा नहीं है। किताब रागों की चर्चा करते हुए भी डराती नहीं है। जिन्हें शास्त्रीय संगीत की ज्यादा जानकारी नहीं है, वे भी इससे जुड़े रहते हैं। कुछ जगह रागों और बंदिशों की डिटेल बताते हुए किताब धीमी पड़ जाती है, लेकिन यही हिस्से बाद में याद भी रह जाते हैं। किताब हर समय भावुक होने की कोशिश नहीं करती। जहां दुख है, वहां ठहराव है। जहां आनंद है, वहां खुलापन है। यह किताब क्यों पढ़नी चाहिए। इस किताब को सिर्फ संगीत सीखने के लिए नहीं पढ़ना चाहिए। इसे इसलिए भी पढ़ना चाहिए, क्योंकि यह किसी आदमी के पूरी ईमानदारी से जिए गए जीवन का दस्तावेज है। किताब यह समझाती है कि किसी भी कला में आगे बढ़ने के लिए सिर्फ टैलेंट काफी नहीं होता, लगातार मेहनत और सालों की साधना भी जरूरी होती है। इतनी प्रसिद्धि मिलने के बाद भी मंसूर साहब हमेशा सीखते रहे। किताब कहीं तेज चलती है, कहीं धीमी हो जाती है, लेकिन यही बात इसे ज्यादा सच्चा और करीब महसूस कराती है। अगर आपको शास्त्रीय संगीत पसंद है, तो यह किताब लगभग जरूरी पढ़ाई जैसी है। अगर आपको कलाकारों की जिंदगी के पीछे की मेहनत जानने में रुचि है, तब भी यह किताब बहुत कुछ देती है। जो लोग आत्मकथाएं पढ़ते हैं, उन्हें इसमें ईमानदारी मिलेगी। जिन्हें संगीत की ज्यादा समझ नहीं है, वे भी इसे पढ़ सकते हैं। ग्राफिक में देखिए, ये किताब किसे पढ़नी चाहिए।





