गोरखनाथ और बाबा फरीद ने इसको प्रारंभिक साहित्यिक स्वरूप दिया
उत्तर प्रदेश पंजाबी अकादमी की ओर से आयोजित की गई पंजाबी भाषा की उत्पत्ति विषयक संगोष्ठी
लखनऊ । उत्तर प्रदेश पंजाबी अकादमी की ओर से पंजाबी भाषा की उत्पत्ति विषयक संगोष्ठी का आयोजन शुक्रवार को अशोक मार्ग इंदिरा भवन स्थित अकादमी कार्यालय में सफलतापूर्वक किया गया। इसमें आमंत्रित विद्वानों ने बताया कि पंजाबी भाषा की उत्पत्ति प्राकृत और अपभ्रंश से आठवीं से नौवीं शताब्दी के मध्य हुई थी। इसको प्रारंभिक साहित्यिक स्वरूप गोरखनाथ और बाबा फरीद ने दिया था। अकादमी निदेशक कामता प्रसाद सिंह ने संगोष्ठी में उपस्थित विद्वानों को अंगवस्त्र एवं स्मृतिचिन्ह भेंट कर सम्मानित करते हुये सभी का साधुवाद आभार व्यक्त किया।
संगोष्ठी में आमंत्रित पंजाबी भाषा के वरिष्ठ विद्वान, लेखक एवं चिंतक नरेन्द्र सिंह मोंगा ने बताया कि पंजाबी भाषा की उत्पत्ति प्राकृत और अपभ्रंश से आठवीं से नौंवीं शताब्दी के मध्य हुई थी। इसको प्रारंभिक साहित्यिक स्वरूप गोरखनाथ और बाबा फरीद ने दिया था। पंजाबी भाषा की सबसे अनूठी विशेषता उसका स्वराघात तंत्र है। यह प्रणाली महाप्राण व्यंजनों के ऐतिहासिक परिवर्तन से विकसित हुई और आज पंजाबी को हिन्दी तथा अन्य उत्तर भारतीय भाषाओं से अलग पहचान देती है। इसी कारण पंजाबी को चीनी, थाई, और वियतनामी भाषाओं की भांति विश्व की प्रमुख टोनल इंडो-आर्य भाषाओं में गिना जाता है। पंजाबी संस्कृति के युवा विशेषज्ञ सरबजीत सिंह ने कहा कि पंजाबी भाषा भारत की प्राचीन भारतीय-आर्य भाषा परंपरा की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। इसकी जड़ें संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश भाषाओं में मिलती हैं। उनके अनुसार विद्वानों का मत है कि शौरसेनी अपभ्रंश से विकसित होकर पंजाबी ने अपना स्वतंत्र स्वरूप ग्रहण किया। पंजाब क्षेत्र में विभिन्न संस्कृतियों और सभ्यताओं के आगमन ने इसके शब्द-भंडार को समृद्ध बनाया इसलिए पंजाबी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि पंजाब की सांस्कृतिक विरासत की जीवंत अभिव्यक्ति है। पंजाबी भाषा की पहचान उसके समृद्ध लोकसाहित्य, सूफी परंपरा और गुरमत साहित्य से निर्मित हुई है। मध्यकाल में सूफी संतों और लोक कवियों ने पंजाबी को जन-जन की भाषा बनाया। बाद में सिख गुरुओं की वाणी ने इसे आध्यात्मिक और साहित्यिक ऊंचाइयां प्रदान कीं। पंजाबी भाषा ने प्रेम, भाईचारे और मानवीय मूल्यों को अभिव्यक्ति देने का कार्य किया, जिसके कारण यह विश्व की प्रमुख भाषाओं में सम्मानित स्थान रखती है।
पंजाबी विदुषी रनदीप कौर के अनुसार वर्तमान में पंजाबी भाषा भारत ही नहीं, बल्कि विश्व के अनेक देशों में बोली और समझी जाती है। वैश्वीकरण के दौर में भी पंजाबी ने अपनी सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखा है। इसकी ध्वन्यात्मक विशेषताएं इसे अन्य उत्तर भारतीय भाषाओं से अलग पहचान देती हैं। शिक्षा, साहित्य, संगीत, सिनेमा और डिजिटल माध्यमों ने इसके प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। पंजाबी भाषा की उत्पत्ति और विकास का अध्ययन हमें भारतीय भाषाई विविधता और सांस्कृतिक एकता को समझने का अवसर प्रदान करता है।
संगोष्ठी में अकादमी निदेशक कामता प्रसाद सिंह सहित अरविन्द नारायण मिश्र, अजीत सिंह, त्रिलोक सिंह बहल, मीना सिंह, महेन्द्र प्रताप वर्मा, रवि यादव, अंजू सिंह सहित पंजाबी समाज के गणमान्य जन एवं श्रोतागण उपस्थित थे। श्रोतागणों द्वारा कार्यक्रम की सराहना करते हुए ऐसे ही धार्मिक सहिष्णुता, बौद्धिक समन्वय और सामाजिक एकता को प्रोत्साहित करने वाले कार्यक्रम की पुनरावृत्ति किये जाने का अनुरोध किया गया।





