लखनऊ। समय के साथ रंगमंच को पेश करने का तरीका भी बदला है। नई नकनीक, नया तरीका, आज के कलाकारों में अभिनय के प्रति नया नजरिया इन सब चीजों ने रंगमंच को एक नया आयाम दिया है। धिरे-धिरे रंगमंच में भी कई बदलाव हुए हैं। इन्हीं सब चीजों को लेकर 50 वर्ष पूरे करने वाले राजधानी के जानेमाने वरिष्ठ रंगकर्मी प्रभात बोस ने वॉयस आॅफ लखनऊ से खास बातचीत की। पेश है बातचीत के प्रमुख अंश…।
आर्ट से हम जीने की कला सीखते हैं
रंगमंच की दुनियां में 50 वर्ष पूरे करने वाले शहर के वरिष्ठ रंगकर्मी प्रभात बोस कहते हैं कि आर्ट और एंटरटेनमेंट में अंतर होता है। मनोरंजन बस टाइमपास के लिए होता है, जबकि आर्ट से हम जीने की कला सीखते हैं। आज ज्यादातर लोग थियेटर को मनोरंजन के तौर पर लेते हैं। वो जुनून नहीं दिखता जो पहले हुआ करता था। लखनऊ का रंगमंच तो सामूहिक प्रयासों से ही समृद्ध हुआ है, हर कोई अपनी भूमिका को बखूबी समझता था, मेहनत करता था। आज उन सामूहिक प्रयासों की कमी खलती है। फिल्म इंस्टीटयूट से पास आउट और राज्यपाल द्वारा कला रत्न से सम्मानित प्रभात बोस आगे कहते हैं कि रंगमंच की दुनियां में मुझे पूरे 50 वर्ष हो चुके हैं और इन 50 वर्षों में मैंने बहुत उतार-चढ़ाव देखे हैं।
आधे-अधूरे से की रंगमंच की शुरूआत
वरिष्ठ रंगकर्मी प्रभात बोस ने रंगमंच की शुरुआत चारबाग के रविन्द्रालय में नाटक आधे-अधूरे से की। इस नाटक को देखने के लिए रविन्द्रालय में दर्शकों की भारी भीड़ आई थी। आगे प्रभात कहते हैं कि अभी तक मैंने पूरे देशभर में 835 नाटकों का मंचन किया है जिसका अभी तक पूरे देश में 1032 शो कर चुका हूं। आगे वो कहते हैं कि मुझे रंगमंच का जुनून ऐसा चढ़ा कि इसी की दुनिया में बस गये। आज तक मैंने 866 नाटक पूरे भारत वर्ष में किये हैं। शुरू में बहुत मुश्किलें हुई। नाटक करने के लिए पैसा नहीं होते थे तो घर का सामान बेच दिया, लेकिन नाटक को रुकने नहीं दिया। पहले भी नाटकों को दायरा पलिक से ही जुड़ा होता था। आज भी वही है, लेकिन आज उद्देश्य पूर्ण नाटकों को सही तरीके से प्रस्तुत नहीं किया जा रहा है। वरगल नाटकों का मंचन नहीं होना चाहिए। आगे कहते हैं कि रंगमंच एक पाठशाला है। यहां पर व्यवसाय नहीं होता। पहले की अपेक्षा रंगमंच सशक्त हुआ है। किसी का एकाधिकार नहीं है। नए प्रयोग हो रहे हैं, जो रंगमंच के लिए शुभ संकेत है।
लखनऊ रंगमंच ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फलक पर अपनी पहचान दर्ज कराई
प्रभात आगे कहते हैं कि लखनऊ में आधुनिक रंगमंच की शुरूआत स्वतंत्रता प्राप्ति के दशक से मानी जा सकती है। तब से लेकर आज तक लगभग सात – आठ दशक का समय बीत चुका है। इस अवधि में लखनऊ रंगमंच ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फलक पर अपनी पहचान दर्ज़ कराई है। हां, मूल्य, सरोकार और सृजनशीलता की दृष्टि से कई बार स्थिति चिंताजनक भी बनी। दरअसल मानव समाज के जीवन मूल्यों और सरोकारों में जो बदलाव आया है उसका दुष्प्रभाव जीवन के हर क्षेत्र पर पड़ा है, रंगमंच भी इससे अछूता नहीं है। दूसरी बात यह है कि इसमें जो नयी पीढ़ी प्रवेश कर रही है उनका उद्देश्य कुछ और है। वह इसमें जीवन के भैतिक सुखों का स्वप्न त्वरित रूप से साकार होता देख रही है। उसके कार्य की प्रकृति और परिभाषा रंगमंच के मूल मल्यों और सरोकारों से भिन्न दिखाई पड़ती है। इसी परिदृश्य के बीच बड़े सुखद आश्चर्य की बात यह भी है कि लखनऊ रंगमंच में ऊर्जा और विचारों के धनी कुछ युवा अपने नाट्य प्रयोगों में जीवन की गहरी पड़ताल करते भी दिखाई पड़ रहे हैं।
प्रेक्षागृहों की हालत खराब, किराया भी बढ़ा
साहित्य और नाट्य कला के प्रमुख शहरों में गिने जाने वाले लखनऊ के कलाकार महंगे किराए और रेनोवेशन के नाम पर बंद किए गए प्रेक्षागृहों की कमी से जूझ रहे हैं। पहले राय उमानाथ बली प्रेक्षागृह फिर बीएनए के थस्ट और बीएम शाह प्रेक्षागृह रेनोवेशन की वजह से बंद किए थे। वो ठीक से खुल भी नहीं पाए थे कि संगीत नाटक अकैडमी के दोनों प्रेक्षागृह भी जीर्णोद्धार के नाम पर बंद कर दिए गए हैं। ऐसे में कलाकार नाट्य मंचन के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हो रहे हैं। शहर में लगातार बंद होती रंगमंचीय गतिविधियों और प्रेक्षागृहों की बदहाली को लेकर प्रभात बोस कहते हैं कि राजधानी में रंगकर्म के लिए उपलब्ध मंच और प्रेक्षागृह लगातार कम होते जा रहे हैं, जिससे थिएटर और सांस्कृतिक गतिविधियां प्रभावित हो रही हैं। संगीत नाटक अकादमी में लंबे समय से निर्माण कार्य चलने के कारण रंगकर्म की गतिविधियां लगभग समाप्त हो गई हैं। राय उमानाथ बली प्रेक्षागृह का किराया बढ़ाकर 15 हजार रुपये कर दिया गया है। वहीं भारतेंदु नाट्य अकादमी भी फिलहाल मंचन के लिए प्रेक्षागृह उपलब्ध नहीं करा रही है। उन्होंने मांग की कि जल्द से जल्द प्रेक्षागृहों की व्यवस्था दुरुस्त की जाए और रंगकर्मियों को रियायती दरों पर मंच उपलब्ध कराए जाएं।





