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पूरी क्षमता से खुलें दफ्तर

कोरोना महामारी के कारण 25 मार्च से लॉकडाउन है और तभी से आवश्यक सेवाओं से जुड़े दफ्तर छोड़ कर बाकी बंद हैं। सचिवालय, विभागाध्यक्षों के कार्यालय कुछ समय से 33 फीसद कर्मचारियों की क्षमता से चलाया जा रहा है और अब प्रदेश सरकार ने 50 प्रतिशत कर्मचारियों की क्षमता के साथ दफ्तरों को चलाने का आदेश दिया है। कर्मचारी नौ बजे से सायं सात बजे तक तीन शिफ्टों में दफ्तार आयेंगे।

लॉकडाउन के कारण बंद पड़े दफ्तरों को धीरे-धीरे शुरू करने करना जरूरी है, लेकिन जिस तरह प्रशासन बहुत अधिक फूंक-फूंक कर कदम आगे बढ़ा रहा है उससे लगता है कि उत्तर प्रदेश सरकार के बीस लाख से अधिक कर्मचारी और शिक्षक सब बेगार में काम करते हैं। इन पर प्रदेश की जनता को कोई त्याग नहीं करना पड़ता है, तभी तो बीते तीन माह से दफ्तर बंद हैं। अगर कर्मचारी अपनी ड्यूटी पर जाते तो हजार-दो हजार रुपये का पेट्रोल खर्च होता, खाने-पीने पर कुछ खर्च करते, इससे सरकार को कुछ टैक्स मिलता, दफ्तरों के आसपास ठेला-रेहड़ी वालों का काम चलता और आम जनता के जरूरी कामों का निस्तारण होता।

लगातार बंदी के कारण महीनों का काम जमा हो गया है और अब भी अगर 50 फीसद कर्मचारियों से ही काम कराने की व्यवस्था की जा रही है, तो लगता है कि सरकार जरूरत से ज्यादा सावधानी बरत रही है। दफतर में हर कर्मचारी के अलग बैठने की व्यवस्था होती है। इसलिए सावधानी के साथ दफ्तरों को खोला जाता है तोआम जनता का काम भी होगा और कोरोना संक्रमण का खतरा भी नहीं रहेगा। महीनों की बंदी के कारण जो काम लंबित हैं उसके कारण दफ्तरों में लोगों की भीड़ बढ़ सकती है। इसलिए दफ्तरों को ईद के बाद न सिर्फ पूरी क्षमता से चलाया जाये बल्कि काम के घंटे बढ़ाने के साथ आगे की छुट्टियों को भी निरस्त करना चाहिए ताकि प्रशासनिक काम तेजी से हो सकें।

वैसे भी सरकारी दफ्तरों के माध्यम से जो काम होते हैं उनमें बाबू बहुत लेट लतीफी करते हैं ताकि उनकी ऊपरी आमदनी बनती रहे। राशन कार्ड जब बाबू बनाते थे तो महीनों लगता था, ऑनलाइन घर बैठे दो दिन में बन जाते हैं। प्रदेश सरकार अपनी तरफ से राज्य को गरीबी से निकालने और विकास को तेज करने का प्रयास कर रही है, लेकिन बाबुओं की कार्यप्रणली में कोई सुधार नहीं हुआ है। इसलिए न सिर्फ कर्मचारियों की सौ फीसद उपस्थिति सुनिश्चित की जाये बल्कि अधिकांश कामो की डिलीवरी घर तक की जाये। किसी भी नागरिक को प्रशासनिक काम के लिए सरकारी दफ्तर आना ही न पड़े।

जब छोटे-छोटे काम के लिए नागरिक दफ्तरों में पैर घिसते हैं, बाबुओं की जी-हुजूरी करते हैं तो इससे लोकतंत्र की मंशा मारी जारी है और बाबूतंत्र मजबूत होता है। उत्तर प्रदेश पहले से ही गरीबी, बेरोजगारी और जनसंख्या के भार से जूझ रहा है। इन समस्याओं को सीमित करने के लिए जरूरी है कि प्रशासनिक काम जल्द हों ताकि विकास का मार्ग अवरूद्ध न होने पाये। यह भी कि गैर जरूरी दस्तावेज,लाइसेंस, रजिस्ट्रेशन जैसी चीजो को खत्म कर दिया जाये। इससे बाबुओं का काम कम होगा और इनका उपयोग अन्य रचनात्मक कामों के लिए किया जाये।

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