श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ का आयोजन
लखनऊ। श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ का आयोजन 4 से 12 जुलाई तक गोमती नगर वास्तु खंड तीन के श्री सिद्धेश्वर महादेव मंदिर पार्क परिसर में किया जा रहा है। इस श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ में कथा व्यास, नैमिष चक्र तीर्थ धाम वाले विनोदानंद शास्त्री जी महाराज है जबकि मुख्य यजमान स्वयं हनुमान जी महाराज और स्वागतकांक्षी शान्ति देवी जी है। इसके प्रथम दिन शनिवार चार जुलाई को विनोदानंद शास्त्री जी महाराज ने संदेश दिया कि “गुण मिले तो गुरु बनाओ, चित मिले तो चेला। मन मिले तो मित्र बनाओ, वरना रहो अकेला।। उनके अनुसार इस दोहे में जीवन के संबंधों की गहरी कसौटी बताई गई है कि यदि किसी व्यक्ति में श्रेष्ठ गुण, ज्ञान, अनुभव और सदाचार दिखाई दें तो उसे गुरु बनाना चाहिए, क्योंकि गुरु वही होता है जो अज्ञान के अंधकार को दूर कर जीवन का मार्ग प्रशस्त करे। यदि किसी का चित्त, अर्थात विचार और लक्ष्य हमारे अनुरूप हों, तो वह शिष्य बनने योग्य है, क्योंकि शिक्षा और संस्कार तभी सफल होते हैं जब गुरु और शिष्य के विचारों में सामंजस्य हो। इसी प्रकार यदि किसी व्यक्ति का मन हमारे मन से मिलता हो, जिसमें प्रेम, विश्वास, सहयोग और सद्भाव हो, तो उसे मित्र बनाना चाहिए। मित्रता केवल परिचय का नाम नहीं है, बल्कि हृदयों के मिलन का नाम है। किन्तु यदि न गुण मिलें, न विचार मिलें और न ही मन का मेल हो, तो ऐसे संबंधों को केवल निभाने के लिए ढोने से बेहतर है कि व्यक्ति अकेला रहे। अकेलापन कभी-कभी गलत संगति से कहीं अधिक कल्याणकारी होता है। विनोदानंद शास्त्री जी महाराज ने भागवत कथा के प्रथम दिन, नैमिषारण्य में एकत्रित ऋषियों और सूतजी महाराज के संवाद का प्रभावी वर्णन किया गया। समस्त ऋषियों ने सूतजी के भीतर ज्ञान, विनम्रता और शास्त्रों का अद्भुत गुण देखा, इसलिए उन्हें अपना गुरु और मार्गदर्शक स्वीकार किया। यही इस दोहे का प्रथम संदेश है कि गुण मिले तो गुरु बनाओ। दूसरी ओर, ऋषिगण अत्यंत श्रद्धा और एकाग्र चित्त के साथ कथा श्रवण के लिए उपस्थित हुए। उनका चित्त भगवान की कथा और लोक कल्याण के उद्देश्य से जुड़ा था, इसलिए वे आदर्श शिष्य बने। यह चित मिले तो चेला का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसके अतिरिक्त, नैमिषारण्य में उपस्थित सभी ऋषियों के मन एक ही उद्देश्य से जुड़े थे—कलियुग के प्राणियों का कल्याण और भगवान की भक्ति का प्रसार। मनों की इसी एकता ने उन्हें सच्चा मित्र और सहयात्री बनाया। इस प्रकार भागवत कथा का प्रथम दिवस इस दोहे की सम्पूर्ण भावना को चरितार्थ करता है। इस प्रकार भागवत हमें सिखाती है कि जीवन में गुरु का चयन गुणों से, शिष्य का चयन विचारों से और मित्र का चयन मन के मेल से करना चाहिए। ऐसे संबंध ही जीवन को सार्थक बनाते हैं और अंतत: हमें भगवान की भक्ति तथा आत्म कल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ाते हैं। इस अवसर पर आगंतुक भक्तों ने सरस भजनों का भी आनंद लिया। आरती-पूजन में भी बड़ी संख्या में भक्तगण एकत्रित हुए।





