मेयर सुषमा खर्कवाल को अनुपस्थित मानकर चलेगा नगर निगम का कामकाज,मेयर के प्रशासनिक एवं वित्तीय अधिकार सीज करते हुए कोर्ट ने हाईकोर्ट ने साफ की स्थिति,हाई कोर्ट ने कहा योगी सरकार आदेश का पालन कराये सुनिश्चित
विधि संवाददाता। लखनऊ। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने राजधानी के फैजुल्लागंज वार्ड से निर्वाचित घोषित पार्षद को शपथ न दिलाने के मामले में मेयर सुषमा खर्कवाल के वित्तीय एवं प्रशासनिक अधिकार सीज करते हुए यह भी स्पष्ट किया है कि नगर निगम का नियमित कार्य प्रभावित नहीं होगा और मेयर की अनुपस्थिति को आकस्मिक अनुपस्थिति मानते हुए निगम का कामकाज नियमानुसार चलता रहेगा। इसके साथ ही कोर्ट ने योगी सरकार को तत्काल आदेश का अनुपालन सुनिश्चित कराने के भी निर्देश दिए हैं।
कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 29 मई को नियत करते हुए मेयर को फिर से चेतावनी भी दी है कि यदि तब तक आदेश का पालन नहीं हुआ तो मेयर को पुन: व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर यह बताना होगा कि उनके खिलाफ अवमानना कार्यवाही क्यों न शुरू की जाए। इससे पहले कोर्ट ने टिप्पणी की कि मेयर अपनी वैधानिक जिम्मेदारी निभाने में पूरी तरह विफल रही हैं और शपथ न दिलाने का कोई कानूनी अवरोध या संतोषजनक कारण भी प्रस्तुत नहीं किया गया।
मामले में गुरुवार को सुनाये गये विस्तृत आदेश की प्रति हाई कोर्ट की वेबसाइट पर शुक्रवार को अपलोड हुई जिसमें न्यायमूर्ति आलोक माथुर एवं न्यायमूर्ति सैय्यद कमर हसन रिजवी की पीठ ने कहा है कि यदि न्यायालय अपने आदेशों के पालन को सुनिश्चित न कर सके तो आदेश केवल कागजी घोषणा बनकर रह जाएंगे और कानून के शासन पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। कोर्ट ने आदेश के बावजूद मेयर की ओर से नवनिर्वाचित सभासद को शपथ न दिलाने के अड़ियल रवैये पर सख्त लहजे में टिप्पणी की कि संवैधानिक अदालतें अपने आदेशों की लगातार अवहेलना होने पर मूकदर्शक नहीं बनी रह सकतीं। नवनिर्वाचित सभासद ललित किशोर तिवारी की याचिका पर सुनवायी करते हुए कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मेयर के अधिकारों पर रोक दंडात्मक कार्रवाई नहीं, बल्कि न्यायालय के आदेशों के अनुपालन को सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया संवैधानिक कदम है।
मामले में पूर्व में हाईकोर्ट ने मेयर को सात दिनों के भीतर याची को शपथ दिलाने का निर्देश दिया था और अनुपालन हलफनामा दाखिल करने को कहा था। कोर्ट ने यह भी कहा था कि आदेश का पालन न होने पर मेयर और जिलाधिकारी व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होंगे। सुनवाई के दौरान मेयर की ओर से व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट का प्रार्थना पत्र दाखिल किया गया, जिसमें बताया गया कि उन्हें हीट स्ट्रोक होने के कारण 20 मई को कमांड अस्पताल में भर्ती कराया गया है।
हालांकि पीठ ने पाया था कि हलफनामे में आदेश के अनुपालन या शपथ दिलाने की मंशा तक का कोई उल्लेख नहीं किया गया। पीठ ने कहा कि चुनाव न्यायाधिकरण की ओर से याची को निर्वाचित घोषित किए जाने के बाद उसे अब तक शपथ नहीं दिलाई गई, जिससे वह लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेने से वंचित है। कोर्ट ने यह भी कहा कि सुनवाई के दौरान नगर निगम की ओर से उपस्थित अधिवक्ता एस एस चौहान से पूछा गया कि आखिर कब तक शपथ दिलाई जाएगी, लेकिन कोई जवाब नहीं दिया गया। इससे स्पष्ट है कि मेयर जानबूझकर अदालत के आदेश का पालन नहीं करना चाहते। कोर्ट ने कहा कि यदि वह अपने आदेशों के पालन को सुनिश्चित न कर सकेगा तो आदेश केवल कागजी घोषणा बनकर रह जाएंगे और कानून के शासन पर प्रतिकूल असर पड़ेगा।





