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शिक्षा के नाम पर लूट

उत्तर प्रदेश में सरकारी शिक्षा की कैसी दुर्दशा है, इसे समझने के लिए स्कूल में जाकर निरीक्षण या सत्यापन करने की जरूरत नहीं है। बीते सालों में शिक्षा विभाग की कारस्तानी की खबरें पढ़ लीजिए, बस आपको पता चल जायेगा कि प्रदेश में सरकारी शिक्षा की व्यवस्था कैसी है? अब तो जिनके बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं वे भी यह मानते हैं कि शिक्षा के नाम संचालित सरकारी स्कूल के नाम पर गरीबों की गाढ़ी कमाई व्यर्थ में जाया होती है।

यही कारण है कि प्रदेश में निजी क्षेत्र में विद्यालयों की संख्या लगातार बढ़ रही है जहां कम वेतन पर भी शिक्षक सरकारी विद्यालयों से अच्छी शिक्षा देते हैं। पूर्व में फर्जी शिक्षक, फर्जी डिग्री पर अध्यापन करने वाले शिक्षक, स्कूलों में पढ़ाने के बजाय राजनीति करने वाले शिक्षक, स्टेपनी शिक्षक, रविवार के बजाय शुक्रवार को बंद रहने वाले विद्यालय, आदि के बारे में बहुत कुछ पढ़ा-सुना जा चुका है। इसी कड़ी में सरकारी शिक्षा की पोल खोलने वाला नया मामला सामने आया है जिसमें अनामिका शुक्ला उर्फ अनामिका सिंह उर्फ सुप्रिया सिंह जैसे अनेक नामों से कायमगंज की एक लड़की प्रदेश के 25 सरकारी विद्यालयों में एक साथ नौकरी कर रही थी।

अनामिका ने अलग-अलग 25 विद्यालयों से वेतन के रूप में एक करोड़ से अधिक धनराशि प्राप्त की। सरकारी नौकरी आज इतनी कठिन है कि एक नौकरी के लिए बड़े-बड़ों के पसीने छूट जाते हैं। पूर्व में उत्तर प्रदेश में चपरासी के कुछ पद निकले थे जिसमें एमबीए, बीटेक , पीएचडी, एमसीसी, एमए, एमएससी, बीएड, एलएलबी जैसी बड़ी डिग्री वालों सहित कुल 23 लाख अभ्यर्थियों ने करीब सवा सौ पदों के लिए आवेदन किया था। एक तरफ एक-एक सीट पर हजारों-हजार अभ्यर्थी आवेदन करते हैं और अधिकांश को सरकारी नौकरी नहीं मिलती है और दूसरी तरफ एक महिला फर्जी डिग्री एवं फर्जी नाम पते पर ही 25 सरकारी विद्यालयों में नौकरी पा जाती है।

ऐसा कैसे हो सकता है? जो सरकार बिना आधार कार्ड के राशन तक नहीं देती है, एक बोरी यूरिया के लिए भी आधार कार्ड लगाना पड़ता है, छोटी-छोटी बातों के लिए आधार और पैन कार्ड मांगे जाते हैं। वहां बिना आधार कार्ड के, बिना शैक्षिक प्रमाण पत्रों के सत्यापन के, बिना पता सत्यापन के दरअसल आवेदन पत्र ही खारिज हो जाना चाहिए था, लेकिन आवेदन की बात तो छोड़िये हजारों सही अभ्यर्थियों को पीछे छोड़कर एक फजी डिग्री वाली लड़की पच्चीस विद्यालयों में एक साथ नौकरी पा गयी, सब जगह पढ़ा भी लिया और जब मामला प्रकाश में आया तो वाट्सएप से इस्तीफा भी भेज दिया।

फर्जी नाम, पता एवं डिग्री से नौकरी, कागजों पर अध्यापन और वाट्सएप से इस्तीफा, यह ऐसा कारनामा है जो उत्तर प्रदेश सरकार की प्रशासनिक मशीनरी ही अंजाम दे सकती है। निश्चय ही जिस लड़की को 25 जगह नौकरी करने के मामले में पकड़ा गया है वह असली दोषी नहीं है। इसका मास्टरमाइंड कोई और है जो फर्जी नियुक्तियों के जरिए वेतन आहरित कराता है और फिर हिस्सा बांटता है। इस पूरे प्रकरण की गंभीर जांच की जरूरत है कि कैसे गरीब बेटियों को पढ़ाने के नाम पर संचालित कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय में बड़े स्तर पर फर्जी वाड़ा हो रहा है।

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