लखनऊ। कजरी तीज हिंदू धर्म के प्रमुख व्रत-त्योहारों में से एक है, जिसे सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र, सुखी वैवाहिक जीवन और परिवार की खुशहाली के लिए श्रद्धापूर्वक मनाती हैं। यह पर्व सावन के बाद आने वाले भाद्रपद कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। इस दिन महिलाएं निर्जला या फलाहार व्रत रखकर भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करती हैं। मान्यता है कि कजरी तीज का व्रत दांपत्य जीवन में प्रेम और सुख-समृद्धि बढ़ाने वाला होता है। इस साल कजरी तीज 31 अगस्त को मनाई जाएगी।
कजरी तीज पूजा का शुभ मुहूर्त 2026
वैदिक पंचांग के अनुसार इस दिन अभिजीत मुहूर्त दोपहर में 11:56 ए एम से 12:47 पी एम तक है। इस बीच में पूजा- अर्चना कर सकते हैं।
कजरी तीज का धार्मिक महत्व
कजरी तीज पर महिलाएं व्रत रखती हैं, माता पार्वती और भगवान शिव की पूजा करती हैं। साथ ही कथा सुनती हैं। कई स्थानों पर इस दिन झूला झूलने, कजरी गीत गाने और सुहाग की वस्तुओं का दान करने की भी परंपरा है। मान्यताओं के अनुसार, भोलेनाथ को पति रूप में प्राप्त करने के लिए देवी पार्वती ने कठोर तपस्या की थी और साथ ही, कजरी तीज का व्रत भी किया था। यही कारण है कि कुंवारी कन्याएं भी अच्छे वर की कामना से यह व्रत करती हैं। इस दिन सोलह श्रृंगार करने का भी खास महत्व बताया गया है और शाम को चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है।
कजरी तीज की पूजन विधि
कजरी तीज के दिन व्रती महिलाएं सुबह स्नानादि के बाद नए या साफ वस्त्र पहनें. फिर व्रत का संकल्प लें. इसके बाद पूजा की तैयारी शुरू करें. सबसे पहले स्थानीय परंपरा के अनुसार, मिट्टी और गोबर से तालाब के आकार की आकृति बनाई जाती है और उसके पास नीम की डाली स्थापित कर उसे नीमड़ी माता के रूप में पूजा जाता है. इसके बाद भगवान शिव और माता पार्वती का पूजन किया जाता है. भगवान के समक्ष रोली, अक्षत, मेहंदी, फल-फूल, मिठाई, वस्त्र और सुहाग से जुड़ी सामग्री रखी जाती है. अलग-अलग क्षेत्रों में पूजा की विधि में कुछ स्थानीय परंपराएं भी जुड़ी हो सकती हैं. कई जगहों पर फल और मिठाई की जगह सत्तू से बने भोग अर्पित किए जाते हैं।
रात में चंद्रमा को अर्घ्य
कजरी तीज की पूजा में रात के समय चंद्र दर्शन का भी विशेष महत्व बताया गया है. शाम के समय चंद्रमा दिखाई देने के बाद जल में थोड़ा सा दूध, रोली और अक्षत मिलाकर उन्हें अर्घ्य दिया जाता है. इसके बाद व्रत कथा पढ़ी या सुनी जाती है. इसके बाद ही यह व्रत संपन्न माना जाता है।





