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किसान आंदोलन, चौ. चरण सिंह और लोहिया

किसान आंदोलन के सम्पूर्ण घटनाक्रम में महान प्रगतिशील समाजवादी चिन्तक डा. राम मनोहर लोहिया व किसान नेता और भारतीय गणराज्य के प्रधानमंत्री रहे चौधरी चरण सिंह की याद आना स्वाभाविक है। एक दृष्टिपात कृषि व कृषकों के परिप्रेक्ष्य में दोनों महान विभूतियों की वैचारिक विरासत पर डालना समीचीन होगा। किसानों के संदर्भ में लोहिया और चौधरी चरण सिंह समविचारी अथवा समान दृष्टिकोण के वाहक थे।

वैचारिक साम्य के कारण ही 4 अप्रैल 1967 को लोहिया ने कहा था कि, ‘चरण सिंह गाँव व किसान के हित का प्रभावशाली प्रतिनिधित्व करते हैं, मैं चरण सिंह की प्रशंसा करता हूँ। वे केन्द्र में बेहतर विकल्प होंगे।’, अप्रैल 27, 1967 को पेट्रियाट को दिए गए साक्षात्कार में लोहिया ने अपनी बात दोहराई कि यदि केन्द्र में चरण सिंह या अजय मुखर्जी गैर-कांग्रेसी सरकार का नेतृत्व करेंगे तो ज्यादा पसंद करुँगा।

अप्रैल 1967 में उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री और जुलाई 1979 में चौधरी साहब को प्रधानमंत्री बनाने में लोहियावादियों की महती भूमिका थी। चरण सिंह ने जमींदारी उन्मूलन अधिनियम लाकर किसानों को शोषण से मुक्त कराने का सद्प्रयास किया। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में चकबंदी को दृढ़तापूर्वक लागू करवाया। चरण सिंह की सरकारें लोहिया के विचारों पर चलने वाली किसान हितैषी सरकारें थीं।

मंडी-प्रणाली में चरण सिंह के सुधारों को लोहियावादी मुलायम सिंह व शिवपाल सिंह ने आगे बढ़ाया और नई राजस्व संहित लाए जो किसानों को न्याय दिलाने के लिए थी। अन्न समिति की बैठक में घनश्याम दास बिड़ला का विरोध करते हुए लोहिया ने कहा था कि किसानी-उपज को औद्योगिक उत्पादों की तरह लाभकारी बनाना होगा। वे चाहते थे कि गाँवों में एकाकी और दरिद्रता की जिंदगी काटने वाले करोड़ों किसान नई संस्कृति के जन्मदाता हों और इसी तरह मुल्क के किसान देश की दैनंदिन जीवन पर स्थायी और सतत असर डालें।

लोहिया का यह सपना आज भी साकार होने के लिए तड़प रहा है। जो लोग किसानों के आंदोलन व प्रदर्शन के औचित्य पर प्रश्न खड़ा कर रहे हैं, उन्हें एक बार गाँधी, लोहिया व चरण सिंह का गौरवशाली इतिहास पढ़ना चाहिए। किसानों की समस्या को प्रभावशाली स्वर देने एवं समाधान के लिए 1949 में हिन्द किसान पंचायत की स्थापना हुई जिसका अध्यक्ष लोहिया जी को चुना गया था।

इसके बाद 25 नवम्बर 1949 को गोमती के तट पर किसानों का विशाल जमावड़ा, प्रदर्शन व विधान सभा तक मार्च हुआ जिसका उद्देश्य गन्ने का कम दाम व दस गुना लगान की जबरिया वसूली का विरोध था। उस समय की सरकार ने भी किसानों का अनादर किया। प्रदर्शन रोकने के लिए पुलिस का प्रयोग किया। किसान-आंदोलन भड़क उठा।

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