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आत्म साधना का महत्व

हमारे प्रयासों में हमेशा नियमितता होनी चाहिए। व्यायाम शाला में नित नये उत्साह के साथ जूझते रहने वाले पहलवान की मन:स्थिति और गतिविधि का यदि गंभीरतापूर्वक अध्ययन किया जाये तो आत्मासाधना के विद्यार्थी को विदित हो सकता है कि उसे आखिर करना क्या पड़ेगा? पहलवान मात्र कसरत करके ही निश्चिंत नहीं हो जाता वरन पौष्टिक भोजन की, संयम की, ब्रह्मचर्य ही, मालिश की, उपयुक्त दिनचर्याकी, प्रसन्नता-निश्चिंतता की भी व्यवस्था करता है।

यदि उन सब बातों की उपेक्षा की जाये और मात्र दण्ड बैठको ंको ही जादू की छड़ी मान लिया जाये तो सफलता दूर की खीज ही बनी रहेगी। एकाकी कसरत से कुछ भला न हो सकेगा। उपासनात्मक विधि विधान की अपनी ही महत्ता है पर उतने भर से काम नहीं चलता। चिंतन और कर्तव्य की रीति नीति भी लक्ष्य के अनुरूप ही ढालनी पड़ेगी। गायक और वादक एक दिन में अपने विषय में पारंगत नहीं हो जाते, उन्हें स्वर की, नाद की साधना नित्य निरंतर करनी पड़ती है।

रियास न किया जाये, तो गायक का स्वर छितराने लगता है और वादक ही अंगुलियां जकड़ मकड़ दिखाने लगती हैं। संगीत सम्मेलन तो यदा कदा ही होते हैं पर वहां तक पहुंचाने वाली स्वर साधना को नित्य ही अपनाये रहना पड़ता है। गीत सुनने वालों ने कितनी प्रशंसा की और कितनी धररािश दी यह बात गौण रहती है। संगीत साधक आत्मतुष्टि की नित्य मिलने वाली प्रसन्न्ता को ही पर्याप्त मानता है और बाहर से कुछ भी न मिले तो भी वह एकान्त जंगल की किसी कुटिया में रहकर भी आजीवन बिना ऊबे संगीत साधना करता रह सकता है।

आत्मसाधक की मन:स्थिति इतनी तो होनी ही चाहिए। नतर्क, अभिनेता, अपना अभ्यास जारी रखते हैं। शिल्पी और कलाकार जानते हैं कि उन्हें अपने प्रयोजन के लिए नित्य नियमित अभ्यास करना चाहिए। फौजी सैनिकों को अनिवार्य रूप से परेड़ करनी पड़ती है। अभ्यास टूट जाने पर न तो गोली का निशना ठीक बैठता है औरन मोर्चे पर लड़ने के लिए जिस कौशल की आवश्यकता पड़ती है वह हाथ रहता है।

किसी विशेष प्रयोजन के लिए नियम संख तथा नियत अवधि की साधना से किसी पूजा प्रयोजन का संकल्प लेने वाला समाधान हो सकता है पर आत्म साधक को इतने भर से संतोष नहीं मिलता। वह जानता है कि प्यास बुझाने के लिए रोज कुएं से पानी खींचना पड़ता है और सफाई रखने के लिए रोज ही कमरे को बुहारना पड़ता है। मानवी सत्ता की स्थिति भी ऐसी ही है। उसकी हीरो भरी खदान को हर दिन खोदना कुरेदना चाहिए। तभी नित्य नये उपहार मिलने की संभावना प्रबल होती है।

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