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रेल सेवाओं को बंद रखना कितना जायज

भारत में कोविड संक्र मण की दरें पिछले दो महीने में तेजी से घटी हैं और इसके वैक्सिनेशन की प्रक्रिया भी अब शुरू हो चुकी है पर इसके उपरांत भी सरकार द्वारा भारतीय रेलवे को पूरे तौर से खोलने को लेकर किसी भी तरह की सुगबुगाहट नहीं दिखाना रेलवे को लेकर कई तरह के संशय पैदा कर रहा है।

मार्च 2020 में लॉकडाउन की घोषणा के तहत पूरी तरह से बंद कर दी गई रेल पैसेंजर सेवाओं को 1 जून 2020 से आंशिक तौर से तब खोला गया, जब लंबी दूरी की 200 ट्रेनों के परिचालन की शुरू आत हुई। बाकी उसके इतर ठप रखी गई सभी रेलवे पैसेंजर सेवाएं तब से आज भी वैसे ही हैं। मुंबई की उपनगरीय ट्रेन सेवाओं जिनके जरिये प्रतिदिन करीब एक करोड़ यात्रियों को ढोया जाता है, जिनमें ज्यादा भीडभाड़ होने से कोविड संक्रमण की संभावना काफी बलवती थी, उनकी भी अब शुरू आत की जा चुकी हैं।

कई महानगरों में मेट्रो ट्रेन सेवाओं का परिचालन शुरू हो चुका है परंतु भारतीय रेलवे जिनके करीब पांच हजार ट्रेनों के जरिये करीब तीन करोड़ यात्रियों को प्रतिदिन ढोया जाता है, जिनसे देश में हर तरह के आवगमन, रोजगार, वाणिज्य, व्यापार तथा श्रम और श्रमिकों की देशव्यापी गतिशीलता सुनिश्चित होती है, उसे अभी भी नब्बे फीसद ठप रखना बेहद हैरतनाक है।

अब जबकि हम नये बजट के जरिये आगामी नये वित्त वर्ष में विकास दर को पुन: पटरी पर लाने और अर्थव्यवस्था के शिथिल पड़े सभी सेक्टरों को गतिशील बनाने की योजनाएं बना रहे हैं, तो उसमें इसके एक बेहद प्रमुख निर्धारक तत्व रेलवे को ठप रखा जाना समझ से परे है। कहना न होगा मौजूदा परिस्थिति में अब रेलवे को लेकर कई तरह के कयास लगने भी शुरू हो गए है।

भारतीय रेलवे में माल सेवाएं जिनके जरिये रेलवे के कुल राजस्व का तिहाई हिस्सा प्राप्त होता है तथा जिन पर रेलवे के कुल खर्चे का केवल एक तिहाई व्यय होता है, वह तो बदस्तूर चल रही हैं। दूसरा जिन दो सौ ट्रेनों का परिचालन शुरू किया गया है, वे सभी ट्रेन रू टें मुनाफे वाली बतायी जाती हैं जिनको परिचालित करने में रेलवे को घाटा नहीं है। पैसेंजर सेवाओं के बाकी बंद पड़े सिगमेंट सरकार के लिए घाटे की भी सबब हैं, जिससे इन कयासों को बल मिल रहा है कि सरकार को कोरोना महामारी के मद्देनजर इन्हें जो बंद करने का मौका मिला उन्हें इसी बहाने सदा के लिए बंद कर दिया जाए।

हालांकि सरकार की तरफ से इस बाबत कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है, पर सरकार की तरफ से इस पर दर्शायी अनिर्णय की स्थिति उपरोक्त संदेह के लिए पुख्ता आधार भी प्रदान कर रही हैं। ऐसा माना जा रहा है कि भारत सरकार ने रेलवे को बंद कर लंबी दूरी और नजदीकी दूरी वाले दोनों यात्रियों को सड़क परिवहन के विकल्प का उपयोग करने के लिए मजबूर किया है।

इसके पीछे भी एक षड़यंत्र छिपे होने का कयास ये है कि जिस तरह से कोरोनाकाल में पेट्रोलियम उत्पादों पर केन्द्र व राज्यों ने अपने करारोपण में भारी वृद्घि कर चुकी हैं, उससे रेलवे के अभाव की मजबूरी में सड़क परिवहन के ज्यादा उपयोग होने से सरकारों के पेट्रोलियम कर राजस्व में भारी बढ़ोत्तरी होगी और कोविड की वजह से सरकारों के राजस्व में आयी कमी की इससे अच्छे तरीके से भरपाई सुनिश्चित हो सकेगी। रेल पैसेंजर सेवाओं के पूरे तौर से परिचालन नहीं किये जाने के पीछे सरकार की मंशा इसके निजीकरण की भी हो सकती है।

कहना होगा कि पिछले वर्ष कोरोनाकाल के दौरान भारत सरकार ने करीब 110 ट्रेनों को निजी क्षेत्र से परिचालित किये जाने की घोषणा की थी। परंतु सरकार ने यह फैसला न तो रेलवे में किसी रेगुलेटर स्थापना के जरिये लिया और न ही रेलवे में पीपीपी यानी सार्वजनिक व निजी साझेदारी माड्यूल के जरिये कोई योजना बनायी और ना ही रेलवे कानून में किसी तरह के संशोधन के जरिये इन्हें अंजाम देने का फैसला लिया।

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