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लोक कला का दमकता सूरज आज अस्त हो गया : मालिनी अवस्थी

पंडवानी गायिका डॉ. तीजन बाई के निधन से कला जगत में शोक की लहर
लखनऊ। छत्तीसगढ़ की माटी की सुरीली और बेबाक आवाज, जिसने दुनिया भर के मंचों पर महाभारत के पात्रों को जीवंत किया, वह आज हमेशा के लिए मौन हो गई। देश की सबसे प्रतिष्ठित लोक कलाकारों में शुमार और पद्म विभूषण से सम्मानित पंडवानी गायिका डॉ. तीजन बाई का रविवार तड़के रायपुर के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में निधन हो गया। वे 70 वर्ष की थीं और पिछले काफी समय से उम्र संबंधी गंभीर बीमारियों के कारण बेड पर थीं। उनके निधन से कला जगत में शोक की लहर फ ैल गयी। शहर की तमाम कला जगत की हस्तियों ने पंडवानी गायिका डॉ. तीजन बाई के निधन से शोक व्यक्त किया और अपने-अपने तरीके से श्रद्धांजलि दी।
लखनऊ की जानीमानी लोक गायिका मालिनी अवस्थी ने कहा स्तब्ध और नि:शब्द हूँ। लोक कला का दमकता सूरज आज अस्त हो गया। आदरणीया तीजन बाई दीदी का जाना भारतीय लोक-परंपरा के लिए अपूरणीय क्षति है। हाथ में तंबूरा लिए ‘पंडवानी’ गाती उनकी बुलंद आवाज और वह असीम ऊर्जा हमेशा हमारे दिलों में गूँजती रहेगी।

डॉ. तीजन बाई को लखनऊ में मिला था ‘लोकनिर्मला सम्मान’
छत्तीसगढ़ की महान पंडवानी गायिका और पद्म विभूषण से सम्मानित डॉ. तीजन बाई को लखनऊ में मार्च 2020 में ‘सोनचिरैया संस्था’ द्वारा ‘लोकनिर्मला सम्मान’ और उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी में विशेष रूप से सम्मानित किया गया था। यह सम्मान समारोह गोमतीनगर स्थित संगीत नाटक अकादमी के संत गाडगे परिसर और मुख्यमंत्री आवास पर आयोजित किया गया था। उन्हें निजी क्षेत्र में लोक कला के संवर्धन के लिए ‘लोकनिर्मला सम्मान’ से नवाजा गया था। इस अवसर पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, वरिष्ठ गायिका मालिनी अवस्थी और अन्य गणमान्य उपस्थित थे। सम्मान प्राप्त करने के बाद, खराब स्वास्थ्य के बावजूद तीजन बाई ने अपने तंबूरा और एकतारा के साथ महाभारत (दुशासन वध) की सशक्त पंडवानी प्रस्तुति दी थी

पुरुषों के वर्चस्व को दी चुनौती, खड़ी की नई लकीर
तीजन बाई का जाना सिर्फ एक कलाकार का जाना नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की उस सांस्कृतिक क्रांति के एक युग का अंत है जिसने आधी आबादी को खुलकर अपनी कला प्रदर्शित करने का हौसला दिया। मात्र 13 साल की उम्र में जब उन्होंने पहला मंच प्रदर्शन किया, तब महिलाएं केवल बैठकर ‘वेदमती शैली’ में पंडवानी गाती थीं। तीजन बाई ने उस दौर के सामाजिक बंधनों और पुरुषों के वर्चस्व को चुनौती देते हुए ‘कापालिक शैली’ को चुना। उन्होंने हाथ में तंबूरा लेकर, खड़े होकर और गरजती हुई आवाज में महाभारत के प्रसंगों का गान शुरू किया, जो इतिहास बन गया।

गांव से निकलकर जापान और पेरिस तक का सफर
दुर्ग जिले के गनियारी गांव में जन्मी तीजन बाई ने लोक कला को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वह सम्मान दिलाया जिसकी कल्पना भी मुश्किल थी। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से लेकर दुनिया के कई राष्ट्राध्यक्षों के सामने प्रस्तुतियां दीं। कला के क्षेत्र में उनके अप्रतिम योगदान के लिए उन्हें 1987 में पद्मश्री, 2003 में पद्म भूषण और 2019 में देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से नवाजा गया। इसके अलावा उन्हें जापान का प्रतिष्ठित फुकुओका कला पुरस्कार भी मिला था।

देश के साथ विदेशी राष्ट्राध्यक्षों के सामने दीं शानदार प्रस्तुतियां
उनकी इस अनूठी प्रतिभा को प्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर ने पहचाना, जिसके बाद तीजन बाई का जीवन पूरी तरह बदल गया. उन्होंने देश की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से लेकर दुनिया के कई राष्ट्राध्यक्षों के सामने अपनी शानदार प्रस्तुतियां दीं. उन्होंने इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी, तुर्की और मॉरीशस सहित 17 से अधिक देशों में छत्तीसगढ़ की समृद्ध संस्कृति का डंका बजाया।

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