समुचित दायित्वों के निर्वाह के संबंध में हमें अपने आपे का परिचय प्राप्त करना चाहिए और साथ ही समुचित कर्म निर्वाह के लिए जो मिला है उसका संचालन भी जानना चाहिए। इन प्रश्नों का उत्तर प्राप्त करने के लिए हमें आत्म विस्मृति से उबरना चाहिए। यह आत्म विस्मृति ही मायाजाल है। इससे उबर कर जो यथार्थता है उसे समझ लेने को आत्मज्ञान कहते हैं। इसे प्राप्त कर लेने पर माया की तन्द्रा से अपने को उबार लेने पर मनुष्य उस ज्ञान का अधिकारी बन जाता है जिसे सर्वश्रेष्ठ साध्य कहा गया है।
यहां जीव का निजी स्वरूप और उसे उपलब्ध जीवन सम्पदा तथा विशिष्ट साधनों की जानकारी उपलब्ध करनी चाहिए। जीवन जिसे सौंपा गया है, वह असाधारण गरिमा सम्पन्न जीवात्मा है। जीवात्मा ईश्वर का एक अंश एवं युवराज है। उसे वरिष्ठता एवं विशिष्टता इसलिए दी गयी है कि वह अपनी त्रुटियों का निष्कासन करते हुए पूर्णता से लक्ष्य तक पहुंचे। ईश्वर में जितनी कुछ विशेषताएं व विभूतियां हैं वे सभी मनुष्य के अन्तराल मे बीज रूप में छिपाकर रखी गयी है। यह इसलिए कि पात्रता के अनुरूप वह उसका महत्व समझे और प्रयन्त पूर्वक उन्हें खोजने का पुरुषार्थ करके हस्तगत करे।
मन को स्वस्थ, समर्थ व तत्पर रखना भी एक कला है। उसे जानकार अभ्यास में उतार लेने पर संकल्प बल व मनोबल के सहारे वह अपने तथा दूसरों के लिए बहुत कुछ कर सकता है। यही बात शरीर के सबंध में है। उसकी अनुचित छेड़छाड़ न की जाये तो स्वस्थ समर्थ निरोग एवं बलिष्ठ रहकर वह दीर्घजीवन का आनन्द ले सकता है तथा इस समर्थ साधन के सहारे मन की पे्ररणाओं को प्रत्यक्ष चरितार्थ करके दिखा सकता है।
इसके विपरीत यदि अनाड़ीपन से काम लिया जाये तो शरीर और मन दोनों ही रुग्ण रहने लगते हैं और ऐसी कुटेवं अपनाते हैं जिनके कारण जीवन भारपूत लगे और उनका निर्वाह ही भारभूत प्रतीत होने लगे।मनोविकारों से ग्रसित व्यक्ति शरीर और सबंधियों के साथ अपनी कुटेवों के कारण दुर्व्यवहार करने लगते हैं। शरीर पर भी अनुचित भार लादते हैं। फलत: वह जीवात्मा के उत्तरदायित्वों में हाथ बांटाना तो दूर उद्विग्नता और रुग्णता के शिकार हो जाते हैं। इस स्थिति से हमें बचना चाहिए।
बनाड़ी ड्राइवर अच्छी खासी मोटर को किसी पेड़ से टकराकर खाई में पटक देता है और न केवल यह बहुमूल्यवान वाहन का वरन बैठी हुई सवारियों का भी कचूमर निकाल देता है। ऐसी दशा में उसका लाइसेंस भी जब्त हो जाता है। जीवन की अपूर्णता को पूर्णता तक पहुंचा देना यह इस मानव जीवन रूपी सुयोग में उठाया जा सकने वाला सर्वोत्तम स्वार्थ है।





