शुरूआत में प्रमोशन का तरीका थोड़ा अलग था
लखनऊ। कृष्णावतारम भाग 1: हृदयम को मिल रहे शानदार रिस्पॉन्स और दर्शकों के अपार प्यार से पूरी टीम बेहद उत्साहित है। हाल ही में खास बातचीत में फिल्म के कलाकार सिद्धार्थ गुप्ता और संस्कृति जयना ने फिल्म की सफलता, अपने किरदारों की तैयारी, शूटिंग के चुनौतीपूर्ण अनुभव और दर्शकों से मिल रहे स्नेह पर खुलकर बात की।
फिल्म को इतना अच्छा रिस्पॉन्स मिल रहा है, जबकि इसकी प्रमोशन भी ज्यादा नहीं हुई , कैसा महसूस हो रहा है?
सिद्धार्थ गुप्ता : हम बहुत खुश हैं। हमें लग रहा है कि हमारी मेहनत रंग लाई है। शुरूआत में प्रमोशन का तरीका थोड़ा अलग था। आमतौर पर फिल्मों की रिलीज से पहले बहुत प्रमोशन होता है, लेकिन हमारी फिल्म का वर्ड आॅफ माउथ इतना अच्छा गया कि रिलीज के बाद हमने प्रमोशन और बढ़ाया। यह सब बहुत रियल नहीं लगता है. एक-एक छोटी जीत मिलती गई—पहले फिल्म मिलना, फिर उस पर अच्छा काम करना, फिर रिलीज होना और अब दर्शकों का इतना प्यार , यही सबसे बड़ी खुशी है।
संस्कृति जयना : यह एहसास सचमुच अविश्वसनीय है। हम हर दिन अलग-अलग जगहों पर जा रहे हैं, लोगों से मिल रहे हैं, इसलिए अभी तक पूरी तरह समझ ही नहीं पा रहे कि आखिर क्या हो रहा है. लेकिन जो प्यार और सराहना मिल रही है, वह बेहद सुखद है. हम इस प्रतिक्रिया से अभिभूत हैं और सबसे ज्यादा आभार महसूस कर रहे हैं. यह हमारी मेहनत और समर्पण का फल है।
आप की बहुत तारीफ हो रही है , यह कैसे तैयार किए?
सिद्धार्थ गुप्ता : मैंने पहले से कुछ तय नहीं किया था कि आंखों से ऐसा करूंगा या वैसा. मेरी पूरी तैयारी किताबों और वर्कशॉप्स के जरिए हुई , मैं किरदार को भीतर से महसूस करने की कोशिश कर रहा था—वह कैसे बोलेगा, कैसे सांस लेगा और उसकी आंखों में क्या भाव होंगे। जब तैयारी मजबूत होती है, तो अभिव्यक्ति स्वाभाविक रूप से सामने आती है , वही भाव स्क्रीन पर नजर आए।
जब आपको पहली बार यह रोल आॅफर हुआ था, क्या आपने सोचा था कि इतना बड़ा रिस्पॉन्स मिलेगा?
संस्कृति जयना : सच कहूं तो शुरूआत में मुझे यकीन ही नहीं हुआ था , मैं अपनी ही दुनिया में थी कि क्या यह सच में हो सकता है। हम दोनों लंबे समय से मुंबई में संघर्ष कर रहे थे और जानते थे कि नए कलाकारों को इतना बड़ा अवसर आसानी से नहीं मिलता। जब निर्देशक ने पहली बार मुझे यह किरदार समझाया और अपना विजन दिखाया, तब मुझे लगा कि यह फिल्म बहुत बड़ी बनने वाली है। मैंने अपने परिवार से भी कहा था कि फिल्म तो जरूर बनेगी, लेकिन शायद हमारे साथ नहीं. आज भी यकीन नहीं होता कि हम इसका हिस्सा बने।
सिद्धार्थ गुप्ता : मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही था , शुरूआत में मुझे भी इस बात पर विश्वास नहीं हो रहा था।
कृष्ण का किरदार निभाना कितना चुनौतीपूर्ण था? क्या कोई दबाव था?
सिद्धार्थ गुप्ता : शुरूआत में मैं उस दबाव से थोड़ा अनजान था। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान मुझे कान्हा से प्यार हो गया। मैंने इस किरदार के लिए सिर्फ पढ़ाई की—ग्रंथ पढ़े, वेद पढ़े, शास्त्र पढ़े। मैंने किसी पुराने को नहीं देखा , जो कुछ भी बनाया, अपनी समझ और पढ़ाई के आधार पर बनाया। शायद इसी वजह से मैं दबाव महसूस नहीं कर पाया। अब जब फिल्म रिलीज हो चुकी है, तब समझ आ रही है कि यह कितना बड़ा किरदार है। मैं मानता हूं कि हम किरदार नहीं चुनते, बल्कि किरदार हमें चुनते हैं। मैंने इस भूमिका को पूरी ईमानदारी और पूरी गंभीरता के साथ निभाया है।
आपके लिए सत्यभामा का किरदार निभाने का अनुभव कैसा रहा?
संस्कृति जयना : यह मेरे लिए बेहद संतोषजनक अनुभव रहा. हमारी युवा पीढ़ी कई ऐसी कहानियों से अनजान है. जैसे हम छोटी दिवाली तो मनाते हैं, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इसका संबंध सत्यभामा और भगवान कृष्ण द्वारा नरकासुर वध से है , जब मुझे यह किरदार मिला, तो मैंने जिम्मेदारी महसूस की कि उनकी कहानी पूरी ईमानदारी से लोगों तक पहुंचाऊं। एक कलाकार के तौर पर यह मेरे लिए बेहद रोमांचक अनुभव था।
मथुरा में ट्रेलर लॉन्च का अनुभव कैसा रहा?
सिद्धार्थ गुप्ता : वह पल मेरे लिए बेहद अविश्वसनीय था. हमें बताया गया कि कृष्ण जन्मभूमि में इस तरह का ट्रेलर लॉन्च पहले कभी नहीं हुआ था , वहां की ऊर्जा ही बिल्कुल अलग थी। ऐसा महसूस हुआ जैसे यह सिर्फ फिल्म का प्रमोशन नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक यात्रा का हिस्सा हो।
संस्कृति जयना : हमारे निमार्ता का विजन बहुत साफ था। वह इसे किसी मॉल या थिएटर में लॉन्च नहीं करना चाहते थे , क्योंकि यह फिल्म भक्तों के लिए बनाई गई है. हमने गौशाला गए, मां यशोदा से जुड़े स्थानों पर समय बिताया।
शूटिंग के दौरान सबसे चुनौतीपूर्ण हिस्सा क्या था?
संस्कृति जैन: गुजरात का शेड्यूल काफी चुनौतीपूर्ण रहा. 45-47 डिग्री तापमान, भारी-भरकम कॉस्ट्यूम्स और भावनात्मक रूप से गहन दृश्य—इन सबके बीच ग्रीन स्क्रीन के साथ काम करना आसान नहीं था , लेकिन यह मेरे लिए एक बेहतरीन सीखने वाला अनुभव साबित हुआ।
सिद्धार्थ गुप्ता: अगर उस समय हम तनाव लेते, तो हमारी परफॉर्मेंस पर असर पड़ता. हम बस उस पल को जी रहे थे और अपना सर्वश्रेष्ठ देने पर ध्यान दे रहे थे , बाद में एहसास हुआ कि हमने कितना बड़ा और खास काम किया है।
क्या यह फिल्म सिर्फ कमाई के लिए है या इसके पीछे कोई बड़ा उद्देश्य है?
सिद्धार्थ गुप्ता: यह फिल्म सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं है. इसका उद्देश्य हमारी संस्कृति और इतिहास को मनोरंजक अंदाज में लोगों तक पहुंचाना है। अगर दर्शक इससे जुड़ते हैं और कुछ सीखते हैं, तो वही इसकी सबसे बड़ी सफलता होगी।
संस्कृति जैन: यह फिल्म पूरी तरह श्रद्धा और समर्पण के साथ बनाई गई है , लेकिन हां, इसका अच्छा प्रदर्शन करना भी जरूरी है, क्योंकि नए कलाकारों को ऐसी बड़ी अवसर तभी मिलते हैं जब फिल्में सफल होती हैं।
दर्शकों के लिए आपका संदेश?
सिद्धार्थ गुप्ता: जिन लोगों ने फिल्म देख ली है, उनका दिल से धन्यवाद , और जिन्होंने अभी तक नहीं देखी है, उनसे बस यही कहना चाहूंगा कि इसे जरूर देखें। अगर आपने इसे 8-9 बार देख लिया है, तो 10वीं बार भी जरूर देखिए।
संस्कृति जैन: हम बेहद आभारी हैं कि लोगों ने हमारी मेहनत और हमारी नीयत को समझा और सराहा , हमने इस फिल्म को पूरे दिल और समर्पण के साथ बनाया है। यह हमारी संस्कृति और इतिहास से जुड़ी कहानी है, जिसे हर किसी को जरूर देखना चाहिए।





