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चेहरे बदले, तकनीक बदली पर नहीं बदला ‘राम’ का जादू

200 बार पर्दे पर उतरी मयार्दा पुरुषोत्तम की गाथा
लखनऊ। भारतीय संस्कृति में ‘रामायण’ सिर्फ एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि एक ऐसा अहसास है जो हर पीढ़ी के रग-रग में बसा है। यही कारण है कि जब भारतीय सिनेमा ने अपने नन्हे कदम रखे थे, तब से लेकर आज के आधुनिक विजुअल इफेक्ट्स के दौर तक, फिल्मकारों के लिए ‘राम कथा’ सबसे प्रिय विषय रही है। हाल ही में रणबीर कपूर की आने वाली फिल्म ‘रामायण’ के टीजर ने एक बार फिर इस चर्चा को छेड़ दिया है कि आखिर क्यों 100 साल बीत जाने के बाद भी इस कहानी का जादू कम नहीं हुआ।

मूक फिल्मों से शुरू हुआ सफर

रामायण को पर्दे पर उतारने की शुरूआत तब हुई जब फिल्मों में आवाज नहीं होती थी। साल 1917 में भारतीय सिनेमा के पितामह दादा साहब फाल्के ने ‘लंका दहन’ बनाई थी। उस दौर में श्रद्धा का आलम यह था कि लोग सिनेमाघरों में जूते उतारकर बैठते थे और जैसे ही स्क्रीन पर प्रभु श्री राम प्रकट होते, लोग हाथ जोड़कर नमन करने लगते थे। इसके बाद 1934 में देबाकी कुमार बोस की फिल्म ‘सीता’ आई, जिसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान बनाई।

हर दशक का अपना ‘राम अवतार’

40 और 50 के दशक में ‘भारत मिलाप’ और ‘राम राज्य’ जैसी फिल्मों ने सफलता के झंडे गाड़े। दिलचस्प बात यह है कि ‘राम राज्य’ उस दौर की इकलौती ऐसी फिल्म थी जिसे महात्मा गांधी ने देखा था। जैसे-जैसे सिनेमा तकनीक में आगे बढ़ा, दक्षिण भारतीय सिनेमा ने भी इस महागाथा को अपनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। एन.टी. रामा राव (ठळफ) जैसे दिग्गजों ने पर्दे पर श्री राम का ऐसा जीवंत रूप लिया कि लोग उन्हें वास्तव में भगवान मानने लगे थे।

रामानंद सागर का वो ‘स्वर्ण युग’

जब भी रामायण का जिक्र होता है, 80 के दशक के उस दौर को भुलाया नहीं जा सकता जब रविवार की सुबह सड़कें सूनी हो जाया करती थीं। रामानंद सागर के टीवी शो ‘रामायण’ ने इतिहास रच दिया। अरुण गोविल और दीपिका चिखलिया घर-घर में पूजे जाने लगे। यह सिर्फ एक शो नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय उत्सव बन गया था, जिसने रामायण को हर छोटे-बड़े घर के ड्राइंग रूम तक पहुंचा दिया।

एनिमेशन और आधुनिक प्रयोग

सिर्फ फीचर फिल्में ही नहीं, बल्कि एनिमेशन के जरिए भी बच्चों को राम कथा से जोड़ा गया। 1992 की जापानी एनिमेशन फिल्म ‘द लीजेंड आॅफ प्रिंस रामा’ आज भी एक मास्टरपीस मानी जाती है। समय बदला और तकनीक ने अपनी जगह बनाई, जिसके बाद ‘आदिपुरुष’ जैसे बड़े बजट के प्रयोग भी हुए। हालांकि, ‘आदिपुरुष’ को अपनी भाषा और चित्रण के कारण आलोचना झेलनी पड़ी, लेकिन इसने यह साबित कर दिया कि दर्शक रामायण के मूल स्वरूप के साथ कोई समझौता नहीं करना चाहते।

सिल्वर स्क्रीन पर लौट रहा है फिर से पौराणिक फिल्मों का स्वर्ण युग
पर्दे पर लौट रहा है फिर से पौराणिक फिल्मों का स्वर्ण युग
लखनऊ। सिल्वर स्क्रीन पर एक बार फिर से पौराणिक फिल्मों का स्वर्ण युग लौट रहा है। आस्था, ईश्वर और धर्म पर आधारित फिल्में जीवन का सही अर्थ समझाती हैं। सिनेमा जब धार्मिक गाथाओं को बड़े पर्दे पर दशार्ता है तो वह केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति और आत्मा का सेतु बन जाता है। यही वजह है कि आने वाले दिनों में कई पौराणिक फिल्में कतार में हैं।
इनमें दो हिस्सों में बन रही नितेश तिवारी निर्देशित फिल्म रामायणम के अलावा विक्की कौशल अभिनीत महावतार परशुराम, ऋषभ शेट्टी अभिनीत जय हनुमान व हार्दिक गज्जर निर्देशित कृष्णावतारम चर्चा में हैं।फिल्म रामायणम में राम और परशुराम दोनों भूमिकाएं निभा रहे अभिनेता रणबीर कपूर ने हाल ही में कहा था, ऐसा मौका मिलना मेरे लिए सौभाग्य की बात है। एक तरफ मैं सेट पर भगवान राम की भूमिका निभा रहा था, वहीं दूसरी तरफ घर जाकर अपनी बेटी को भगवान राम की कहानियां सुना रहा था। मैं देख रहा था कि वह साढ़े तीन साल की बच्ची कितनी दिलचस्पी के साथ उन कहानियों को सुन रही थी। हमारे अंदर भगवान राम के प्रति खिंचाव और प्यार अपने आप ही आ जाता है। हम दुनिया भर के दर्शकों को वही दिखाना चाहते हैं, जिस पर हम सदियों से विश्वास रखते आए हैं।

तकनीक का मिला साथ
पौराणिक कहानियों को दिव्य बनाने में उन्नत तकनीक तथा विजुअल इफेक्ट्स (वीएफएक्स) का भी अच्छा साथ मिल रहा है। फिल्म महावतार परशुराम के लेखक निरेन भट्ट कहते हैं, पुराण और महाकाव्य तो हमारी संस्कृति में बुने हुए हैं। पहले संपूर्ण रामायण और जय संतोषी मां जैसी फिल्में बनती थीं। बीच में प्रत्यक्ष तौर पर पौराणिक कहानियां बननी बहुत कम हो गईं, क्योंकि जिस स्तर पर उन्हें दशार्या जाना चाहिए, वह दशार्ने के लिए हमारे पास तकनीक नहीं थी। अब हमारे पास वो तकनीक और साधन आ चुके हैं। अब हम भी अपनी कहानियों को उस तरीके से कहने का सामर्थ्य रखते हैं कि पूरी दुनिया उन्हें नोटिस करें।

हमारी संस्कृति, हमारे आदर्श
फिल्म हनुमैन के निर्देशक प्रशांत वर्मा पुराणों और ग्रंथों से जुड़ी करीब 12 फिल्में बना रहे हैं। वह कहते हैं, मैं श्रीराम और हनुमान की कहानियां सिनेमा के माध्यम से इसलिए लाना चाहता हूं, क्योंकि आजकल के बच्चे डेडपूल और आयरन मैन जैसे सुपरहीरो बनना चाहते हैं, उन्हें आदर्श मानते हैं। हमारे यहां श्रीराम, कृष्ण और हनुमान जी जैसे आदर्श हैं, जिनके दिखाए मार्ग पर चलकर हम अच्छा जीवन जी सकते हैं। वहीं फिल्म रामायणम के निमार्ता नमित मल्होत्रा इस तरह की फिल्मों और कहानियों को वर्तमान की जरूरत मानते हैं। उनका कहना है, आज हम ऐसी दुनिया में रह रहे हैं, जो बंटी हुई है और टकराव के दौर से गुजर रही है। ऐसे में आज के दौर में भी यह कहानी दुनिया के लिए बहुत प्रासंगिक है।

सबसे जरूरी है समर्पण
सिनेमा रचनात्मक काम है, लेकिन साल 2023 में प्रदर्शित फिल्म आदिपुरुष में कुछ पात्रों के मामले में दिखाई रचनात्मकता लोगों को रास नहीं आई। इसके पीछे की वजह को लेकर फिल्म कृष्णावतारम् : पार्ट 1 द हार्ट के निमार्ता साजन राज कुरुप कहते हैं, इन कहानियों को बताने के लिए सबसे जरूरी है श्रद्धा, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी।
हर निर्णय में यह ध्यान रखना पड़ता है कि हम मयार्दा बनाए रखें, भावनाओं का सम्मान करें और किसी भी प्रकार की अतिशयोक्ति या विकृति से बचें। यहां क्रिएटिविटी से ज्यादा समर्पण काम करता है। हमारी कहानियां भव्य हैं, गहरी हैं और उन्हें उसी स्तर पर दुनिया के सामने लाने के लिए सिनेमा सबसे उपयुक्त माध्यम है।

एनिमेशन और एआइ में भी छाई

भारतीय पुराणों और महाकाव्यों पर आधारित फिल्में एनिमेशन और एआइ के माध्यम से भी खूब बन रही हैं। पिछले साल प्रदर्शित हुई एनिमेशन फिल्म महावतार नरसिम्हा भारत की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली एनिमेटेड फिल्म बन गई है। इस फिल्म की अभूतपूर्व सफलता के बाद मेकर्स ने ‘महावतार सिनेमैटिक यूनिवर्स’ की घोषणा की है, जिसके तहत भगवान विष्णु के अन्य अवतारों पर भी फिल्में बनेंगी। _निमार्ता विक्रम मल्होत्रा एआइ की मदद से चिरंजीवी हनुमान: द इटरनल फिल्म बना रहे हैं।

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