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कैबिनेट फैसला: यूपी में भूजल प्रदूषण पर मिलेगी कड़ी सजा

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में अब भूजल प्रदूषित करने वालों पर सरकारी डंडा चलेगा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई मंत्रिमंडल की मंगलवार को हुई बैठक में भूजल को प्रदूषित करने पर सख्त प्रावधान किये गए हैं। कुल 9 प्रस्तावों को मंजूरी दी गयी है। इस निर्णय की जानकारी देते हुए प्रदेश के जलशक्ति मंत्री महेंद्र सिंह ने बताया कि भूजल के दोहन और उसको प्रदूषित करने के लिए भूजल अधिनियम 2020 बनाया गया है। इसके तहत भूजल प्रदूषित करने वालों के लिए सजा और आर्थिक दंड दोनों का प्रावधान किया गया है।

सिंह ने बताया कि अब जिन लोगों को भूजल प्रदूषित करते हुए पाए जायेंगे उनको पहली बार 6 से 1 साल सजा और दो से लेकर पांच लाख तक आर्थिक दंड वसूला जायेगा। उन्होंने कहा कि दूसरी बार पकडे जाने पर 2 साल से 5 साल तक की सजा और 5 लाख से 10 लाख का आर्थिक दंड वसूला जायेगा। तीसरे बार पकडे जाने पर पांच साल से सात साल की सजा और 10 लाख से 20 लाख का आर्थिक दंड लगाया जायेगा। उन्होंने कहा कि यह उन लोगों पर लागू होगा जो बोरिंग करके पाइप से माध्यम से भूजल प्रदूषित कर रहे हैं।

जलशक्ति मंत्री ने कहा कि इसके अलावा सभी भवनों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग बाध्यकारी होगा। उन्होंने कहा कि यह नियम सभी कॉलेजों, सरकारी और प्राइवेट, दोनों पर लागू होगा। उन्होंने बताया कि भूजल के हिसाब से मौजूदा समय में प्रदेश में 82 ब्लॉक अति-दोहित, 47 ब्लॉक क्रिटिकल और 151 ब्लॉक सेमि क्रिटिकल श्रेणी में आते हैं, जहां भूजल स्तर धीरे-धीरे नीचे जा रहा है। उन्होंने कहा कि सरकार लगातार प्रयास कर रही है कि सेमि क्रिटिकल ब्लॉक्स को सेफ जोन में लाया जा सके। उन्होंने कहा कि इसी कसरत के तहत यह सारे प्रयास किया जा रहे हैं। सिंह ने कहा कि इसी तरह अब सबमर्सिबल पंप लगाने के लिए पंजीकरण करना अनिवार्य कर दिया गया है।

इसमें घरेलु और किसानों से कोई शुल्क नहीं वसूला जायेगा। इसको देखने के लिए हर स्तर पर समिति गठित की जाएगी। उन्होंने बताया कि ग्राम स्तर पर प्रधान समिति का अध्यक्ष होगा और ग्राम विकास अधिकारी उसका सचिव होगा। इसी तरह समितियां जिले स्तर तक बजेंगी। राज्य स्तर पर मुख्य सचिव की अध्यक्षता में समिति बनायीं जाएगी, जिसके भूजल निदेशालय के निदेशक उसके सचिव होंगे। यह समितियां उद्योगों के लिए शुल्क निर्धारण करेगी।

जलशक्ति मंत्री ने बताया कि यह सारी कार्यवाही आनलाइन होगी और समयबद्ध तरीके से होगा। अगर किसी व्यक्ति और उद्योग को समय से नो-आब्जेक्शन सर्टिफिकेट नहीं मिलेगा तो यह मान लिया जायेगा कि उसको अनुमति मिल गयी हैं। उन्होंने कहा कि इसमें एक खास बात यह भी है कि ड्रिल करने वाली कंपनियों को भी पंजीकरण कराना अनिवार्य होगा। उन्होंने बताया कि उनको अनुमति एक शर्त के साथ दी जाएगी की वह रेन वाटर हार्वेस्टिंग के लिए प्रावधान करेंगे। उन्होंने कहा कि शहरी क्षेत्र में 300 वर्गमीटर से बड़ा निर्माण करने के लिए रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाना बाध्यकारी होगा। सिंह ने कहा कि जिन बिल्डिंगों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग का प्रावधान नहीं है उनको एक वर्ष का समय दिया जायेगा। उन्होंने कहा कि इस तरह के प्रावधान इसलिए किये गए हैं क्योंकि शहरी क्षेत्रों में अब जमीन से पानी नीचे जाने की संभावना नहीं है तो इसका हल रेन वाटर हार्वेस्टिंग प्रणाली से किया जायेगा।

 

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