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संगीत-नाटक जैसी कलाओं से जुड़ें किशोरों में मानवता भी जागृत होती है

नाटक बूंद पानी की ने महिलाओं को अपने सम्मान के लिए ऊदा देवी की भांति संघर्ष का मार्ग दिखाया
लखनऊ। उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी के माननीय अध्यक्ष प्रो. जयंत खोत एवं उपाध्यक्ष विभा सिंह की कुशल परिकल्पना एवं संयोजन में मंगलवार को अकादमी परिसर में स्थित संत गाडगे जी महाराज प्रेक्षागृह में अकादमी द्वारा संचालित ग्रीष्मकालीन नाट्य प्रशिक्षण कार्यशाला की प्रभावी प्रस्तुति हुईं। इसमें शैलेश श्रीवास्तव के निर्देशन में नाटक बूंद पानी की का मंचन किया गया। इसके साथ ही राकेश सिन्हा के निर्देशन में संचालित फोटोग्राफी कार्यशाला में तैयार तस्वीरों की मनमोहक प्रदर्शनी भी आयोजित की गई। इसमें शास्त्रीय नृत्यांगना, वास्तुकला, घुड़सवार, उगता सूरज ही नहीं अकादमी परिसर के भी दृश्यों को प्रभावी रूप से दशार्या गया था।
इस अवसर पर नाट्य प्रस्तुति आयोजन की मुख्य अतिथि, राज्य महिला आयोग की उपाध्यक्ष अपर्णा यादव ने बताया कि लम्बे अंतराल के बाद यह उनका पहला सार्वजनिक संगीत समारोह है जिसमें वह सहभागिता कर पा रही हैं। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि विभिन्न रिसर्च के आधार पर यह कहा जा सकता है कि जो किशोर, संगीत और नाटक आदि कलाओं से जुड़ा रहता है उसका मस्तिष्क अस्सी प्रतिशत अधिक विकसित होता है। उनमें मानवीय प्रकृति ज्यादा होती है। यह बात उन्होंने स्वयं महसूस भी की है क्यों कि उन्होंने संगीत का विधिवत ज्ञानार्जन किया है। उन्होंने यह भी कहा कि समाज में जो विकृतियां बढ़ रही हैं उनका एक कारण यह भी है कि किशोर कलाओं से दूर हो रहे हैं। अकादमी के कृते निदेशक सौरभ सक्सेना के अनुसार दो दिवसीय इस समारोह की प्रथम संध्या पर 22 जून को जहां गायन, वादन और नृत्य की कार्यशालाओं की प्रस्तुतियां हुई थी वहीं दूसरी संध्या पर नाट्य कार्यशाला की प्रस्तुति का मंचन किया गया। इस समारोह में प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र भी वितरित किये गए।
उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी सम्मान 2020 से अलंकृत शैलेश श्रीवास्तव को सांस्कृतिक योग्यता के आधार पर रेलवे में नियुक्ति एवं 33 वर्षों का लम्बा सेवा अनुभव है। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार नई दिल्ली द्वारा उत्कृष्ट निर्देशक के रूप में सम्मानित शैलेश श्रीवास्तव महज 12 वर्ष की अल्पायु से ही मंच पर गीत, संगीत एवं नाटक के माध्यम से सक्रिय हैं। थियेटर, टी.वी. एवं फिल्म आदि में निर्देशक के रूप में, लगभग 40 वर्षों से सक्रिय शैलेश को लगभग 80 नाटकों के 150 मंचन, 9 फीचर फिल्मों का निर्देशन, टीवी धारावाहिक, लघु फिल्मों, वृत्त चित्रों, यू एस के टेम्पावे व फ्लोरिडा अन्तराष्ट्रीय फिल्म महोत्सवों, बीबीसी के लिए क्षणिकाओं व लघु फिल्मों का स्व निर्देशित प्रदर्शन का अनुभव है। वर्तमान में, सोशल मीडिया चैनल पर शैलेश प्रोम्पटर द्वारा, एक्टिंग को अपना करियर बनाने की इच्छा रखने वाले युवाओं को अभिनय के बारे में जानकारी और टिप्स दे रहे हैं।
उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी और मंजुश्री लखनऊ के संयुक्त तत्वावधान में वीर वीरांगना ऊदा देवी पर आधारित नाटक बूँद पानी की का मंचन शैलेश श्रीवास्तव की परिकल्पना एवं निर्देशन में किया गया। निर्देशक के अनुसार यह नाटक सच्ची घटना पर आधारित है। कथानक के अनुसार 1857 के स्वतंत्रता संग्राम क दौर में 16 नवम्बर की शाम को जब अंग्रेज, रेजिडेन्सी की ओर लौट रहे थे तभी फिरंगी फौज पर सिकंदरबाग के नजदीक उन पर जोरदार हमला हो गया। उस हमले में उनके 32 सिपाहियों और अफसरों को गोलियों का शिकार होना पड़ा था। इस संघर्ष में जब आक्रमणकारी क्रान्तिकारी के शव की शिनाख्त करवाई तो सभी स्तब्ध रह गए। वो महान शहीद एक महिला थी, जिनका नाम जगरानी उर्फ ऊदा देवी पासी था। ऊदा देवी पासी की बहादुरी से प्रभावित होकर, फिरंगियों की टोली ने उन्हें, सैल्यूट कर, सम्मान दिया, जो इतिहास में संभवत: पहली बार हुआ।
नाटक का आरंभ धरती बोले, गगन पुकारे, जागो देश के वीर नाट्य गीत से हुआ। इस क्रम में ढोल बजाओ, रण सजाओ, आज कहानी गाएंगे, ऊदा देवी की वीर गाथा, जन जन तक पहुंचाएंगे के माध्यम से नाटक में वीरांगना ऊदा देवी की वीरगाथा आरंभ की गई। इसके उपरांत नाटक का मुख्य कथ्य सामने आया जिसमें गांव में कुएं के पानी के लिए समाज के सम्पन्न और उपेक्षित वर्ग के बीच संघर्ष को पेश किया गया। इसमें कहा गया कि रोटी कम, ताने ज्यादा मिले, कैसा ये सम्मान, प्यास लगी तो कुंए छीने, छिन गया हर अधिकार। इसके उपरांत इस कुप्रथा के विरोध में आवाह्न गीत गाया गया जिसके बोल थे दलित बेटी अब न रोएगी, अब न सिर झुकाएगी, रण में कूदेगी, बिजली बनकर, इतिहास नया बनाएगी। इसमें चूड़ी नहीं तलवार उठाओ के जयघोष पर प्रेक्षागृह तालियों से गूंज उठा।

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