लखनऊ। सनातन धर्म में नवरात्रों का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना गया है। यह समय शक्ति की उपासना, साधना और आत्मशुद्धि के लिए अत्यंत पवित्र माना जाता है। वर्ष में कुल चार नवरात्र होते हैं-दो सामान्य और दो गुप्त नवरात्र। इनमें से गुप्त नवरात्र विशेष रूप से तांत्रिक साधना, देवी के रहस्यमयी स्वरूपों की आराधना और गहन साधना के लिए प्रसिद्ध हैं। माना जाता है कि इस अवधि में की गई पूजा-अर्चना और साधना शीघ्र फल देती है और साधक को देवी शक्ति की विशेष कृपा प्राप्त होती है। आषाढ़ माह में आने वाला गुप्त नवरात्र भी इन्हीं में से एक महत्वपूर्ण अवसर है। यह नवरात्र आषाढ़ शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से प्रारंभ होता है और नवमी तक चलता है। इस दौरान नौ दुर्गा के साथ-साथ दस महाविद्याओं की भी विशेष पूजा की जाती है, जिससे साधक को आध्यात्मिक उन्नति और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है। आषाढ़ गुप्त नवरात्र 2026 में आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा तिथि 14 जुलाई की दोपहर से शुरू होकर 15 जुलाई की सुबह तक रहेगी। इसी आधार पर 15 जुलाई 2026 को घटस्थापना की जाएगी और इसी दिन से नवरात्र का आरंभ माना जाएगा। यह पर्व 23 जुलाई 2026 को नवमी तिथि पर समाप्त होगा।
घटस्थापना मुहूर्त
पंचांग के अनुसार घटस्थापना का शुभ समय 15 जुलाई को सुबह 06:01 बजे से 10:17 बजे तक रहेगा। इस अवधि में पूजा करना अत्यंत शुभ माना गया है।
साधना और शक्ति उपासना का दुर्लभ समय
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गुप्त नवरात्रि सामान्य नवरात्रि की तुलना में अधिक गूढ़ और साधना प्रधान मानी जाती है। इस दौरान तंत्र, मंत्र और आध्यात्मिक साधना करने वाले लोग विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। हालांकि सामान्य श्रद्धालु भी मां दुर्गा की भक्ति करके देवी का आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं. कई लोग इस दौरान अपने घर में अखंड ज्योति जलाते हैं, दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं और नियमित रूप से मां के मंत्रों का जाप करते हैं। माना जाता है कि ऐसा करने से मानसिक शांति, आत्मविश्वास और सकारात्मक ऊर्जा में वृद्धि होती है।
मां काली से मिलता है निर्भयता का आशीर्वाद
मां काली की साधना को भय और शत्रु बाधा दूर करने वाला माना जाता है. मान्यता है कि उनकी कृपा से व्यक्ति कठिन परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति प्राप्त करता है.
मां तारा देती हैं ज्ञान और सफलता
मां तारा की उपासना करने वाले भक्तों को आध्यात्मिक उन्नति और जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में सफलता मिलने की मान्यता है.
मां त्रिपुर सुंदरी और मां भुवनेश्वरी का महत्व
मां त्रिपुर सुंदरी की पूजा सुख, सौंदर्य और समृद्धि से जुड़ी मानी जाती है. वहीं मां भुवनेश्वरी की कृपा से भूमि, भवन और वैभव की प्राप्ति का आशीर्वाद मिलने की मान्यता है.
मां छिन्नमस्ता और मां त्रिपुर भैरवी की आराधना
मां छिन्नमस्ता की पूजा को बाधाएं दूर करने वाली माना जाता है. वहीं मां त्रिपुर भैरवी अपने भक्तों के जीवन से दुख, रोग और संकट कम करने वाली देवी मानी जाती हैं.
मां धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला
मां धूमावती की साधना जीवन के बड़े दुखों से राहत दिलाने वाली मानी जाती है. मां बगलामुखी की पूजा वाद-विवाद, कानूनी मामलों और विरोधियों पर विजय से जुड़ी मानी जाती है. मां मातंगी ज्ञान और बुद्धि प्रदान करने वाली देवी कही जाती हैं. वहीं मां कमला की कृपा से धन, कारोबार में उन्नति और भौतिक सुख मिलने की मान्यता है.
किस दिन किस देवी की पूजा होगी
15 जुलाई (प्रतिपदा): शैलपुत्री
16 जुलाई (द्वितीया): ब्रह्मचारिणी
17 जुलाई (तृतीया): चंद्रघंटा
18 जुलाई (चतुर्थी/पंचमी): कूष्मांडा और स्कंदमाता
19 जुलाई (षष्ठी): कात्यायनी
20 जुलाई (सप्तमी): कालरात्रि
21 जुलाई (अष्टमी): महागौरी
22-23 जुलाई (नवमी): सिद्धिदात्री
पूजन विधि
प्रात:काल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और मन को शांत रखें। पूजा स्थान को साफ करके मां दुर्गा का ध्यान करें। विधिवत रूप से घटस्थापना करें, जिसे नवरात्र का आरंभ माना जाता है। दीपक जलाएं और यदि संभव हो तो अखंड ज्योति प्रज्वलित करें। मां दुर्गा को पुष्प, अक्षत, रोली, चंदन और नैवेद्य अर्पित करें। फल, मिठाई और सात्विक भोजन का भोग श्रद्धापूर्वक अर्पित करें। दुर्गा चालीसा, दुर्गा सप्तशती या देवी मंत्रों का नियमित पाठ करें। नवरात्र के नौ दिनों तक नियमपूर्वक पूजा और साधना जारी रखें। अंत में मां दुर्गा की आरती करें। प्रसाद सभी भक्तों में श्रद्धापूर्वक वितरित करें।





