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कलाकार धर्मेन्द्र कुमार का जसम की ओर से सम्मान

कला, संस्कृति, समाज व शिक्षा में उनके योगदान पर चर्चा
लखनऊ। जन संस्कृति मंच (जसम) लखनऊ के अध्यक्ष और कला महाविद्यालय, लखनऊ विश्वविद्यालय में प्रोफेसर धर्मेंद्र कुमार की सेवानिवृत्ति पर एक शाम धर्मेंद्र कुमार के साथ का आयोजन किया गया। विकास नगर स्थित उनके आवास कलाघर में आयोजित इस कार्यक्रम में शहर के संस्कृति कर्मियों, कलाकारों, उनके वर्तमान व पूर्व सहकर्मियों, मित्रों, विद्यार्थियों ने शिरकत की और कला, संस्कृति, समाज व शिक्षा में उनके योगदान पर चर्चा की।
जसम की ओर से शाल ओढ़ाकर पुष्प गुच्छ के साथ स्मृति चिन्ह प्रदान कर उन्हें सम्मानित किया गया। जैसे-जैसे शाम गहराई, यह एक आत्मीय मिलन कार्यक्रम में बदलता गया। सभी ने प्रो धर्मेंद्र को नयी पारी के लिए शुभकामनाएं दीं और उम्मीद जतायी कि अब कला को आम जन से जोड़ने में उनकी नयी पहलकदमियां देखने को मिलेंगी। कार्यक्रम का संयोजन तथा सुन्दर संचालन जसम लखनऊ के सचिव फरजाना महदी ने किया।
इस मौके पर कला समीक्षक शहंशाह हुसैन, कलाकार लालजीत अहीर, जसम उत्तर प्रदेश के कार्यकारी अध्यक्ष कौशल किशोर, कलाकार सुशील कन्नौजिया, कला महाविद्यालय के प्रोफेसर आलोक कुमार, सईदा सायरा, कवि-लेखक शैलेश पंडित, पत्रकार सत्य प्रकाश, राकेश कुमार सैनी, आदियोग, रामायण प्रकाश आदि ने कला के क्षेत्र में धर्मेंद्र कुमार के योगदान के साथ सामाजिक व सांस्कृतिक व्यक्तित्व पर खास तौर पर अपनी बात रखी।
एक बात जो तकरीबन हर किसी ने कही कि इस आत्मप्रचार के युग में खामोशी से काम करने वाले प्रो धर्मेंद्र जैसे लोग विरले ही हैं। मूर्तिकला में उन्होंने बेहतरीन काम किया है, लेकिन अपने काम के बारे में बात करने को लेकर वह बहुत संकोची हैं। उनके सहकर्मी रहे लालजीत अहीर ने अफसोस जताया कि विश्वविद्यालय धर्मेंद्र कुमार को समझ नहीं पाया। ऐसी प्रतिभाओं की उपेक्षा का ही नतीजा है कि शानदार अतीत वाला कला महाविद्यालय अपनी चमक खो चुका है।
वक्ताओं ने लखनऊ में स्थापित कला गांव को याद किया जिसे धर्मेंद्र जी ने अपनी कला अध्यापक पत्नी श्रीमती नीता कुमार के साथ मिलकर शुरू किया था। लोगों का कहना था कि धर्मेंद्र जी के अंदर एक ऐसी सामाजिक आग है जो बाहर से नहीं दिखती लेकिन वह अन्दर धधकती रहती है। जब देश में सांप्रदायिक उन्माद चरम पर था, देश में फासीवाद का उभार हो रहा था, उस वक्त अपने महाविद्यालय में फासिस्ट गैलरी की स्थापना की। यह उनके इसी आग का उदाहरण है। वे सामाजिक व सांस्कृतिक आंदोलन की अगली कतार में रहे हैं। यह खुशी की बात है कि सेवानिवृत्त के बाद जन सांस्कृतिक आंदोलन को धर्मेन्द्र कुमार के रूप में एक पूर्णकालिक साथी मिल गया है।
धर्मेन्द्र कुमार के व्यक्तित्व की खूबियों पर चर्चा करते हुए उनके कॉलेज के दिनों के मित्र सुशील कन्नौजिया ने बताया कि कैसे धर्मेंद्र कुमार पढ़ने के लिए जौनपुर से कला महाविद्यालय आये और फिर बाद में वहीं पर प्रोफेसर बने। मार्क्सवाद के प्रति वैचारिक प्रतिबद्धता उन्हें विरासत में मिली थी। उनके पिता एक सक्रिय कम्युनिस्ट कार्यकर्ता थे। अपनी प्रतिबद्धताओं के लिए उन्हें बार-बार विश्वविद्यालय और कला संस्थाओं के प्रशासकों से टकराना पड़ा, जिससे वह कभी पीछे नहीं हटे। अपने साथियों के लिए हमेशा खड़े रहने के उनके स्वभाव का उदाहरण पेश करते हुए एक मित्र ने बताया कि छात्र जीवन में जब वे लोग एक बार शैक्षणिक यात्रा पर थे, तो दो साथी इलाहाबाद में स्टेशन पर छूट गये। धर्मेंद्र जी ट्रेन से उतर गये और बाद में उन्हें लेकर बरौनी में मिले। इस अवसर पर उनकी पुत्री रोचना कुमार व परिवार के सदस्यों तथा उनके छात्र अतुल, निहारिका, आशीष आदि ने अपने अनुभव को साझा किया।

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