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पति के दीघार्यु के लिए सुहागिने 26 को रखेंगी वट सावित्री व्रत

लखनऊ। वट सावित्री व्रत हर साल ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि के दिन रखा जाता है। वट सावित्री व्रत हिंदू धर्म का एक प्रमुख त्योहार है। इसे शनि जयंती के नाम से भी जाना जाता है। वट सावित्री महिलाएं पति की दीघार्यु की कामना के लिए रखती हैं। सबसे पहले वट सावित्री का व्रत राजा अश्वपति की पुत्री सावित्री ने अपने पति सत्यवान के लिए किया था। तभी से वट सावित्री व्रत महिलाएं अपने पति के मंगल कामना के लिए रखती हैं। वट सावित्री व्रत के दिन सुहागिन महिलाएं भूखी प्यासी रहकर व्रत करती हैं। साथ ही वट वृक्ष की पूजा करती हैं। इस व्रत को करने से शनि के नकारात्मक प्रभाव में भी कमी आती है। 2025 में वट सावित्री का व्रत ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि यानी सोमवार 26 मई को रखा जाएगा। पंचांग अनुसार, 26 मई को अमावस्या तिथि का आरंभ दोपहर में 12 बजकर 12 मिनट पर होगा और 27 तारीख को सुबह में 8 बजकर 32 मिनट पर अमावस्या तिथि समाप्त होगी। शास्त्रीय विधान के अनुसार, अमावस्या तिथि दोपहर के समय होने पर वट सावित्री व्रत किया जाता है। इसलिए यह व्रत 26 मई को किया जाएगा।

अखंड सुहाग के लिए शोभन योग में होगी पूजा
अखंड सौभाग्य की कामना को लेकर सुहागिन 26 मई सोमवार को ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या में वट सावित्री का व्रत करेंगी। इस दिन भरणी व कृत्तिका नक्षत्र का युग्म संयोग के साथ शोभन योग विद्यमान रहेगा। 26 मई सोमवार को अमावस्या तिथि 11.02 बजे से आरंभ होकर पूरे दिन रहेगा।
सोमवार को अमावस्या होने से इस दिन सोमवती अमावस्या का पुण्यकारी संयोग बना रहेगा। ऐसे संयोग में वट सावित्री की पूजा फलदायी होगी। ज्योतिष आचार्य पंडित राकेश झा ने पंचांगों के हवाले से बताया कि अभिजीत मुहूर्त दोपहर 11.20 बजे से 12.14 बजे तक रहेगा।

सर्वकामना प्रदायक है वट की पूजा
अग्नि पुराण के अनुसार बरगद उत्सर्जन को दशार्ता है। संतान प्राप्ति के लिए महिलाएं व्रत को करती हैं। अपनी विशेषताओं और लंबे जीवन के कारण वृक्ष को अनश्वर माना गया है, इसलिए इस वृक्ष कई जड़ में पूजा करने से सर्व मनोकामना की पूर्ति एवं बच्चों की निरोग काया व विकास का वरदान मिलता है। वट वृक्ष को अक्षत, पुष्प, चंदन, ऋतुफल, पान, सुपारी, वस्त्र, धुप-दीप आदि से पूजा कर पंखा भी झलेंगी। इसके बाद पौराणिक कथा का श्रवण कर पति परमेश्वर का आशीर्वाद पाएंगी।

मिलेगा अखंड सुहाग का वरदान
वट सावित्री का व्रत एवं इसकी पूजा व परिक्रमा करने से सुहागिनों को अखंड सुहाग, पति की दीघार्यु, उत्तम स्वास्थ्य वंश वृद्धि, दांपत्य जीवन में सुख-शांति तथा वैवाहिक जीवन में आने वाले कष्ट दूर होते हैं। पूजा के बाद भक्ति पूर्वक सत्यवान-सावित्री की कथा का श्रवण और वाचन करना चाहिए।
इससे परिवार पर आने वाली अदृश्य बाधाएं दूर होती हैं तथा घर में सुख-समृद्धि का वास होता है। इस दिन गंगा या तीर्थ में स्नान करने से सहस्त्र गौदान, कोटि सुवर्ण दान के बराबर फल मिलता है। वट की पूजा और परिक्रमा के बाद अन्न, तिल, ऋतुफल आदि का दान करने से समृद्धि तथा गृहस्थ आश्रम ने शांति बनी रहती है।

नवविवाहिता करेंगी विस्तृत पूजन
वट सावित्री की पूजा में मिथिलांचल की नवविवाहिता पूरे विस्तार से वट की पूजा अर्चना करेंगी। शादी के बाद पहली बरसाईत में पूरे दिन उपवास कर सोलह शृंगार कर आंगन को अरिपन से लेप कर पति-पत्नी संग में वट की पूजा नियम-निष्ठा से करने के बाद चौदह बांस से निर्मित लाल-पीला रंग में रंगा हुआ हाथ पंखा से वट वृक्ष को हवा देंगी। इस पूजा में आम और लीची की प्रधानता रहती है। गुड्डा-गुड़िया को सिंदूर दान भी होगा। अहिबातक पातिल यानि रंगा हुआ घड़ा में पूजन की दीपक प्रज्ज्वलित रहेगी। वर पूजा के बाद नव दंपति को बड़े-बुजर्ग महिलाएं धार्मिक व लोकाचार की कई कथाएं सुनती हैं। इसके बाद पांच सुहागिन महिलाएं नवविवाहिता के साथ खीर, पूरी व ऋतुफल का प्रसाद ग्रहण करेंगी। आगंतुक महिला श्रद्धालु एवं कथावाचिका को अंकुरित चना, मुंग, फल, बांस का पंखा देकर उनसे आशीर्वाद प्राप्त करती हैं।

बरगद के पेड़ का धार्मिक महत्व
बरगद का पेड़ न सिर्फ एक वृक्ष है, बल्कि हिंदू आस्था और परंपरा में एक जीवंत प्रतीक है। इसे अक्षय वटवृक्ष कहा जाता है । धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बरगद में त्रिमूर्ति का निवास माना गया है। इसकी जड़ों में ब्रह्मा, तने में विष्णु और शाखाओं में शिव का वास होता है। इसकी लटकती हुई जटाएं मां सावित्री का स्वरूप मानी जाती हैं, जो त्याग, तपस्या और संतान की कामना की देवी हैं।
कहा जाता है कि यक्षों के राजा मणिभद्र से ही इस वटवृक्ष की उत्पत्ति हुई थी, और तभी से यह दिव्यता का वाहक बना। स्त्रियां विशेष रूप से वट सावित्री व्रत के दिन इस पेड़ की पूजा करती हैं, पति की दीघार्यु और संतान सुख की कामना से। बरगद का पेड़, अपने विशाल स्वरूप और छांव के साथ, एक ऐसी छाया देता है जो केवल शरीर को नहीं, आत्मा को भी शांति देती है।

बरगद के पेड़ के नीचे करें ये दान
वट वृक्ष की पूजा के बाद 7 या 11 सुहागिन स्त्रियों को दान देना शुभ माना जाता है। यह दान श्रद्धा और सौभाग्य का प्रतीक होता है, जिसे प्रेमपूर्वक अर्पित किया जाता है। मान्यता है कि इस दान से सुहाग पर कोई संकट नहीं आता और सौभाग्य की रक्षा होती है। त्रिदेव की कृपा प्राप्त होती है जिससे वैवाहिक जीवन में सुख, शांति और प्रेम बना रहता है। इस दिन का दान संतान सुख की प्राप्ति में भी सहायक माना गया है।

पूजा की विधि:
वट सावित्री व्रत वाले दिन सुहागिन महिलाएं सुबह उठ कर स्नान करें। स्नान के बाद इस व्रत का संकल्प लें। सोलह शृंगार करें। साथ ही इस दिन पीला सिंदूर भी जरूर लगाएं। इस दिन बरगद के पेड़ के नीचे सावित्री-सत्यवान और यमराज की मूर्ति रखें। बरगद के पेड़ में जल डालकर उसमें पुष्प, अक्षत, फूल और मिठाई चढ़ाएं। वृक्ष में रक्षा सूत्र बांधकर आशीर्वाद की प्रार्थना करें। वट वृक्ष की कच्च धागा लपेटकर सात परिक्रमा करें इसके बाद हाथ में काले चने को लेकर इस व्रत की कथा सुनें। कथा के बाद ब्राह्मण को दान दें। दान में वस्त्र दक्षिणा और चने दें। अगले दिन व्रत को तोड़ने से पहले बरगद के वृक्ष का कोपल खाकर उपवास समाप्त करें।

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