चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया है। चीन के दो पूर्व रक्षा मंत्रियों वेई फेंगहे और ली शांगफू को भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों में ‘मौत की सजा’ सुनाई गई है। लेकिन यह सामान्य मौत की सजा नहीं है, बल्कि चीन के विशेष कानून के तहत दी गई ‘डेथ सेंटेंस विद रिप्रीव’ है। आइए आपको बताते हैं आखिर ये क्या होता है और चीन में मौत की सजा कैसे दी जाती है।
दोनों मंत्रियों पर सैन्य और राजनीतिक मर्यादा को ठेस पहुंचाने के गंभीर आरोप थे। 2018-2023 तक रक्षा मंत्री रहे वेई फेंगहे को रिश्वत लेने का दोषी पाया गया। वहीं ली शांगफू चीन के इतिहास में सबसे कम समय सिर्फ 7 महीने तक रक्षा मंत्री रहे। इन पर रिश्वत लेने और देने दोनों के आरोप साबित हुए हैं। सैन्य अदालत ने कहा कि इनके कृत्यों ने कम्युनिस्ट पार्टी और सेना को ‘बड़ा नुकसान’ पहुंचाया है। इनकी सारी संपत्ति जब्त कर ली गई है और राजनीतिक अधिकार छीन लिए गए हैं।
चीन की कानूनी प्रणाली में ‘डेथ सेंटेंस विद रिप्रीव’ का मतलब अन्य देशों की सजा-ए-मौत से बिल्कुल अलग होता है। इसमें अपराधी की फांसी को दो साल के लिए टाल दिया जाता है। अगर इन दो वर्षों के दौरान दोषी कोई नया अपराध नहीं करता, तो उसकी मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया जाता है। ली और वेई के मामले में कोर्ट ने साफ किया है कि उनकी सजा उम्रकैद में तो बदलेगी, लेकिन उन्हें कभी पैरोल नहीं मिलेगी और न ही उनकी सजा कम होगी। यानी वे मरते दम तक जेल में ही रहेंगे।
चीन में कैसे दी जाती है मौत की सजा?
चीन में मौत की सजा देने के लिए मुख्य रूप से दो तरीके लीथल इंजेक्शन और फायरिंग स्क्वाड अपनाए जाते हैं। फिलहाल चीन ‘लीथल इंजेक्शन’ को अधिक प्राथमिकता देता है, जिसके लिए विशेष रूप से तैयार की गई ‘एग्जीक्यूशन वैन’ का उपयोग किया जाता है ताकि सजा को बिना किसी सार्वजनिक हंगामे के गुप्त रूप से अंजाम दिया जा सके। नियमों की बात करें तो, चीन में मौत की सजा पाने वाले अपराधियों के अंगों के दान और सजा की तारीख को लेकर अत्यंत गोपनीयता बरती जाती है। यहां तक कि परिवार को भी अक्सर सजा पूरी होने के बाद ही सूचना दी जाती है।
शी जिनपिंग ने 2012 में सत्ता संभालने के बाद से ‘टाइगर्स और फ्लाइज’ अभियान शुरू किया था। वैसे पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के भीतर इस तरह की कार्रवाई दुर्लभ है। रक्षा मंत्रियों को ऐसी सजा देकर शी ने संदेश दिया है कि भ्रष्टाचार के मामले में कोई भी ‘अजेय’ नहीं है। वैसे विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल भ्रष्टाचार की लड़ाई नहीं, बल्कि सेना के भीतर अपनी पकड़ मजबूत करने और विद्रोह की किसी भी संभावना को खत्म करने का तरीका भी है।





