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कोशिश है यूपी को मिले बेहद लोकतांत्रिक और जवाबदेह विधानसभा

-अन्य विधानसभाओं के लिए मिसाल है ‘यूपी विधानसभा’

-अध्यक्ष सतीश महाना के नेतृत्व में नये प्रतिमान गढ़ रही यूपी विधानसभा

मनोज बाजपेई /संजय धीमान

यूपी विधानसभा देश की ऐसी इकलौती विधानसभा है जो पूरे साल चर्चा में रहती है। इसके पीछे का कारण यहां होने वाले नित नये नवाचार हैं। 100 वर्ष से अधिक के इतिहास में 18वीं विधानसभा के गठन के बाद विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना के मार्ग दर्शन में नये प्रतिमान गढेÞ गये। जिसके कारण अब दूसरे राज्यों की विधानसभाओं में भी इसी तर्ज पर नयी कार्यशैली विकसित की जा रही है। यह सब संभव सिर्फ विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना की वजह से हुआ है। कानपुर से आठ बार के विधायक, कई बार मंत्री और 18वीं विधान सभा के निर्विरोध अध्यक्ष 62 साल के सतीश महाना का नाम यूपी की राजनीति में किसी परिचय का मोहताज नहीं है।

विधान सभा में नये विधान रचकर और लोकतंत्र को सशक्त बनाने के लिए लीक से हटकर उन्होंने जो कुछ भी किया है, उसने बदलते समय के साथ यूपी विधानसभा को स्मार्ट और डिजिटल पहचान दी है। विधानसभा को पेपरलेस बनाने की बात हो, महिला विधायकों के लिए विशेष सत्र का आयोजन हो या फिर सदन में नेता सत्ता पक्ष और प्रतिपक्ष की तनातनी को ‘शांत’ करना अथवा विधायक को लाठियों से पीटने वाले छह पुलिस कर्मियों को सदन में अदालत लगाकर सजा देने जैसी पहल, हर मामले में सतीश महाना की चर्चा चौतरफा है।

विधानसभा की बदलती कार्यशैली को लेकर ‘वॉयस आफ लखनऊ’ ने एक विस्तृत बात की। पेश है विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना से बातचीत…

विधानसभा के सदन संचालन की जो नियमावली 1958 में बनी थी, इसमें परिवर्तन की जरूरत कैसे महसूस हुई?

आजादी के 65 साल बाद देश में बहुतेरे परिवर्तन देखने को मिले हैं। नई-नई तकनीक के चलते अब कई अवसरों पर
समय की बचत होती है। जिसके कारण पुराने नियमों का महत्व कम हो गया था। इसके अलावा डिजिटल युग में यदि
कोई विधानसभा सदस्य सदन आने में सक्षम नहीं है तो वह सदन की कार्यवाही में वर्चुअली भी जुड़ सकता है। ऐसे में
1958 के इन्फ्रास्ट्रक्चर में और 1958 की जरूरतों में तथा जनता की आवश्यकताओं को देखते हुुए नियमावली में परिवर्तन करने की आवश्यकता पड़ी। अब जो भी सूचनाएं मांगी जाती हैं उनका त्वरित गति से पालन होता है और यहीं 1958 में तीन-तीन माह लग जाते थे।

महिला विधायकों को लेकर आपके मन में कैसे विचार आया कि इन सदस्यों को भी सदन में बोलने के लिए मौका दिया जाये, वह भी महिला सदस्यों को पूरा दिन ही दे दिया गया?

पांच दिन के सदन में एक दिन महिलाओं को देने का मौका देने पर कुछ सदस्यों ने एतराज किया था तो मैंने कहा कि मैंने 5 दिन में एक दिन महिलाओं को बोलने का मौका नहीं बल्कि 75 सालों में पहली बार महिला सदस्यों को बोलने के लिए प्रोत्साहित किया है। उन्होंने कहा कि महिला विधायक शिकायतों से संबंधित लिखित प्रश्न तो लगाती हैं, लेकिन ज्यादातर मुखर होकर बोल नहीं पातीं। करीब पांच प्रतिशत महिला विधायक ही बहस में मुखर होकर हिस्सा लेती हैं।

बीते मानसून सत्र में विशेष सत्र में महिला सदस्यों ने कार्यवाही में भाग लिया। इस दौरान संबोधन की समय सीमा जो कि तीन से आठ मिनट है, उसे हटा दिया गया। सवा आठ घंटे के सदन में 38 महिलाएं बोलीं। ऐसा पहली बार हुआ है जब अध्यक्ष आसन पर भी उन्हें बैठने का मौका दिया गया। विधानसभा के इतिहास में यह पहली बार है जब आपने न बोलने वाले विधायकों को भी प्रोत्साहित किया और सदन में बोलने का मौका दिया?

एक अच्छी पहल है… हां…बहुत सारे विधायक ऐसे है जो चुपचाप बैठकर सुनते रहते थे और कुछ भी बोलने के लिए खडेÞ नहीं होते थे। मैने ऐसे विधायकों को चिन्हित करवाने का काम किया। ऐसे 39 विधायकों को चिन्हित किया गया जो अब तक सदन में नही बोल सके थें। इन्हें प्रेरित किया गया और सदन में बोलने और अपनी बात रखने के लिए कहा गया। हम इसके लिए भी एक विशेष सत्र बुलाने का मौका देख रहे हैं।

विधायिका को जनमानस के समीप लाने के लिए आपकी क्या योजना है?

विधायिका को जनमानस के समीप लाने तथा उसकी कार्यप्रणाली से लोगों को परिचित कराने के उद्देश्य से विधान सभा के भ्रमण की व्यवस्था आरंभ की जा रही है। विधानसभा मंडल, कॉरिडोर, विधायी लाइब्रेरी समेत अन्य स्थानों को अब प्रदेश के आम नागरिक बिना किसी सिफारिश के देख सकेंगे। विधायिका की कार्यप्रणाली से लोगों को परिचित कराने के उद्देश्य से नई पहल के तहत शोधार्थियों, छात्रों व संसदीय क्षेत्र में रुचि रखने वाले नागरिकों के विधान सभा भ्रमण की व्यवस्था आरंभ की जा रही है।

ऐसा कौन सा फार्मूला है जिसमें सत्ता और विपक्ष दोनो आपके जवाबों से संतुष्ट रहता है?

मैं पक्ष और विपक्ष दोनों के सवाल सुनता हूं या फिर जो वह कहना चाहते है उस दौरान शोर-शराबा नहीं होने
देता हूं और प्रयास करता हूं कि उन्हें सही जवाब देकर संतुष्ट कर सकूं। नेता विपक्ष का पूरा सहयोग सदन को
मिलता है। जब वे बात रखते हैं, पूरी सुनता हूं। हो-हल्ला नहीं होने देता। इससे समय बर्बाद होता है।

आने वाले समय में आप यूपी विधान सभा में और क्या नया करेंगे?

ई-विधान व्यवस्था की समय सीमा अधिकारियों को पहले ही दे दी थी। पेपरलेस काम होने लगा है। उम्दा कैंटीन है। बड़ी-बड़ी दो एलईडी लगी हैं। एक बार में एक सदस्य ही बोलने को खड़ा होता है। गैलरी में प्रेरणा देते महापुरुषों के चित्र हैं। कोशिश है कि आने वाली पीढ़ी को सर्वगुण संपन्न लोकतांत्रिक और जवाबदेह विधानसभा मिले। उन्होंने कहा कि वर्तमान में वह ई-लाइब्रेरी, आईआईएम और आईआईटियंस को बुलाकर विधान मंडल प्रबंधन के गुर सिखाने वाली कक्षाएं शुरू कराने, विशेषज्ञों द्वारा संयुक्त सत्र संबोधन की नयी परंपरा डालने की दिशा में काम कर रहे हैं।

‘कहना गलत न होगा कि विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना के नेतृत्व में यूपी विधानसभा नये कीर्तिमान गढ़ रही है। हाल ही में राजस्थान के उदयपुर में राष्ट्रमंडल संसदीय संघ (सीपीए) के नौवें भारत क्षेत्र सम्मेलन में यूपी विधानसभा में हो रहे बदलावों की सराहना होने के साथ अन्य विधानसभाओं को इससे सीख लेने की बातें कहीं गयी। फिर चाहे लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला हो राज्यसभा सभापति जगदीप धनकड़ हो अथवा यूपी की राजनीति में वर्षों सक्रिय रहे राजस्थान के राज्यपाल कलराज मिश्र हों, सबने मुक्तकंठ से विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना की कार्यशैली की सराहना की।’ विधानसभा में बदलाव का जो दौर शुरू हुआ वह अभी तक चल रहा है।

शुरूआत विधान भवन के सुंदरीकरण के साथ ही विधानमंडल में सभी सदस्यों के टेबल पर ई-विधान के तहत टैबलेट लगवाने, विधायकों को काफी मशीन तथा अन्य आवश्यक संसाधनों को भी उपलब्ध कराया गया। विधानसभा संचालन में भी नए प्रयोग किए है।

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