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सुख-समृद्धि का प्रतीक उत्तराखंड का लोकपर्व हरेला कल

भगवान शिव और माता पार्वती की भी विशेष रूप से पूजा की जाती है
लखनऊ। हरेला उत्तराखंड के प्रमुख लोक पर्व में से एक है जो प्रकृति पूजा और हरियाली के उत्सव के रूप में मनाया जाता है। उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में खासतौर पर मनाए जाने वाला हरेला त्योहार हरियाली और नवजीवन का प्रतीक है और स्थानीय परंपराओं में इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की भी विशेष रूप से पूजा की जाती है। इस दिन हरियाली को बढ़ावा देने के लिए पौधे भी लगाए जाते हैं। हरेला का त्योहार उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र की संस्कृति में रचा बसा हुआ है। हरेला शब्द हरियाली से बना है जो नई फसल की बुवाई, समृद्धि जीवन का प्रतीक है। यह वर्षा ऋतु के आगमन का उत्सव मनाने का भी पर्व है। जब बरसात के बाद खेतों से लेकर पहाड़-मैदान सब लहलहाने लगते हैं। प्रकृति की छटा देखते ही बनती है तब हरेले का त्योहार मनाया जाता है। हरेले का त्योहार सावन मास के एक गते को मनाया जाता है जबकि 9 दिन पहले हरेला बोया जाता है और 10वें दिन इसे काटा जाता है और भगवान व स्थानीय देवी देवताओं को चढ़ाया जाता है। इस साल हरेले का त्योहार 16 जुलाई को मनाया जाएगा जबकि हरेला 7 जुलाई को बोया जाएगा।

हरेला बोने की विधि
हरेला को तिमिले या मालू के पत्ते के दोने या बांस की टोकरी या मिट्टी के बर्तन में बोया जाता है। समय के साथ प्लास्टिक की छोटी टोकरियों ने भी इसका स्थान ले लिया है। तीन, पांच या सात टोकरियों में मिट्टी भरी जाती है और इनमें पांच या सात अनाज डाले जाते हैं। जो कि जौ, गेहूं, मक्का, धान, उड़द, गहत और चना आदि हो सकते हैं। इन्हें साफ स्थान में छाया में रखा जाता है और हर दिन थोड़ा-थोड़ा पानी इनमें डाला जाता है। पांचवें दिन से अनार के पेड़ की लकड़ी से इनकी गुड़ाई की जाती है। इसके बाद दसवें दिन जिस दिन हरेले का त्योहार मनाया जाता है, उस दिन इनकी पूजा की जाती है और इन्हें घर के मंदिर, ईष्ट देवता, ग्राम देवता और स्थानीय देवताओं को चढ़ाया जाता है। माना जाता है कि जितना अच्छा हरेला उगा होगा, उस साल उतनी अच्छी फसल होगी।

हरेला कैसे मनाते हैं
हरेले के दिन पूरी, खीर, पूए, बड़े और अन्य पकवान बनाए जाते हैं। इसके बाद घर के बुजुर्ग बच्चों के पैरों से पूरे शरीर को छुआते हुए हरेले को सिर या कानों पर रखते हैं और आशीर्वाद देते हुए लोक गीत भी गाते हैं: जी रया जागी रया, यो दिन यो बार भेंटने रया। दुब जस फैल जाया, बेरी जस फली जाया। हिमाल में ह्युं छन तक, गंगा ज्यूं में पाणी छन तक, यो दिन और यो मास भेंटने रया। अकास जस उच्च है जे, धरती जस चकोव है जे। स्याव जसि बुद्धि है जो, स्यू जस तराण है जो। जी राये जागी रया। यो दिन यो बार भेंटने रया।यानी जीते रहो, तुम्हारी उम्र लंबी हो। इस दिन हर साल तुमसे मिलना होता रहे। दूब यानी दूर्वा की तरह आपकी प्रतिष्ठा और समृद्धि बढ़ती जाए। बेरी के पौधों की तरफ आप हर हालात में आगे बढ़ते जाएं। जब तक हिमालय में बर्फ रहेगी, गंगा जी में पानी रहेगा तब तक इस दिन मिलना होता रहे। आपका कद आसमान की तरह ऊंचा हो और आप धरती की तरह फलो फूलो, सियार की तरह आपकी बुद्धि तेज हो और शरीर में चीते जैसी ताकत और फुर्ती हो। आप जीते रहें और इस दिन मिलते रहें।

हरेले का महत्व
हालांकि कुमाऊं भर में भी अलग-अलग जगह हरेला बोने की विधि में थोड़ा बदलाव हो सकता है। लेकिन कमोबेश इसी तरह हरेले का त्योहार मनाया जाता है। इसके साथ ही हरेला मनाने के बाद इसके प्रसाद (पैंड़ा) परिवार में बांटा जाता है। इसके साथ ही घर से दूर रहने वालों को चिट्ठी में आशीर्वाद के रूप में हरेले के तिनके भेजे जाते हैं। हरेले का पर्व बच्चों को प्रकृति और पर्यावरण के महत्व का बोध कराता है। पौधे लगाने और उनकी रक्षा करने की प्रेरणा देने वाला यह पर्व एक जीवंत लोक-संस्कृति है।

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