नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मृत्युदंड पाए दोषियों को फांसी देने के बजाय किसी अन्य दर्दरहित या कम दर्दनाक तरीके से सजा देने की मांग वाली जनहित याचिका को खारिज कर दिया है। याचिका में तर्क दिया गया था कि फांसी देकर मौत की सजा देना काफी दर्दनाक और क्रूर तरीका है, इसलिए इसके स्थान पर जहरीला इंजेक्शन (लेथल इंजेक्शन) या कोई अन्य अधिक मानवीय और गरिमापूर्ण तरीका अपनाया जाना चाहिए।
यह महत्वपूर्ण फैसला जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने सुनाया। पीठ ने स्पष्ट किया कि 1983 के संविधान पीठ के उस फैसले पर पुनर्विचार का कोई आधार नहीं बनता, जिसमें फांसी की सजा को संवैधानिक रूप से वैध ठहराया गया था। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि भविष्य में यदि कोई ठोस वैज्ञानिक या मेडिकल साक्ष्य सामने आते हैं, तो इस विषय की दोबारा न्यायिक समीक्षा की जा सकती है। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ कर दिया कि उसके फैसले का असर केंद्र सरकार के अधिकारों पर नहीं पड़ेगा।
यदि केंद्र सरकार चाहे तो कानून, फोरेंसिक मेडिसिन, न्यूरोसाइंस और अपराधशास्त्र के विशेषज्ञों की एक समिति बनाकर मृत्युदंड के मौजूदा तरीके की व्यापक समीक्षा कर सकती है। सरकार अगर किसी ऐसे वैकल्पिक तरीके को तय करना चाहती है जो कम दर्दनाक हो और मानवीय गरिमा के अनुकूल हो, तो वह इस पर स्वतंत्र रूप से विचार कर सकती है। इससे पहले शीर्ष अदालत ने इस मामले से जुड़ी याचिकाओं पर जनवरी 2026 में सुनवाई पूरी कर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।





