नयी दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और सभी राज्य सरकारों को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा संविधान के अनुच्छेद 200 और 201 के तहत विधेयकों पर मंज़ूरी की प्रक्रिया में राज्यपाल और राष्ट्रपति की शक्तियों के संदर्भ में जारी किए गए सवाल पर नोटिस जारी किया है। इन अनुच्छेदों के तहत राज्यपाल और राष्ट्रपति विधेयकों को स्वीकृति देने, अस्वीकार करने या पुनर्विचार के लिए लौटाने का अधिकार रखते हैं।
चीफ जस्टिस बीआर गवई की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने मामले की सुनवाई अगले मंगलवार तक स्थगित कर दी और कहा कि न्यायालय अगस्त में इस पर विस्तार से सुनवाई करेगा। पीठ ने अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी से न्यायालय की सहायता करने का अनुरोध किया। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भारत सरकार की ओर से पक्ष रखने की बात कही और भारत संघ के लिए नोटिस जारी करने की आवश्यकता से इनकार किया।
केरल की ओर से वरिष्ठ वकील केके वेणुगोपाल और तमिलनाडु की ओर से वरिष्ठ वकील पी. विल्सन ने यह मुद्दा उठाया कि वे संदर्भ की स्वीकार्यता पर आपत्ति दर्ज कराएंगे। तमिलनाडु ने कहा कि उनके मामले में पहले ही इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ चुका है।
दरअसल, राष्ट्रपति ने यह संदर्भ तमिलनाडु के राज्यपाल से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले के बाद दिया है। उस फैसले में कहा गया था कि राज्यपाल विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों पर अनिश्चितकालीन विलंब (पॉकेट वीटो) नहीं कर सकते। अदालत ने स्पष्ट किया कि राज्यपाल को तीन महीने के भीतर विधेयक पर निर्णय लेना होगा। यदि विधेयक राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है, तो राष्ट्रपति को भी तीन महीने के भीतर निर्णय करना होगा।





