नई दिल्ली। होर्मुज जलडमरूमध्य के फिर से खुलने से एशिया-प्रशांत क्षेत्र के लिए बड़ा जोखिम कम हुआ है, लेकिन आपूर्ति असंतुलित और महंगी होगी। एसएंडपी ग्लोबल रेटिंग्स ने बृहस्पतिवार को यह बात कही। अमेरिका और ईरान ने 17 जून को एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए। इसमें 60 दिन के भीतर अंतिम समझौते तक पहुंचने की प्रतिबद्धता जतायी गयी है।
समझौता ज्ञापन में होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने और बिना किसी शुल्क के वाणिज्यिक जहाजों के गुजरने का भी जिक्र है। एसएंडपी ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि अमेरिका-ईरान के बीच एमओयू सकारात्मक है, लेकिन ईरान का परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों में ढील, क्षेत्रीय सुरक्षा और इजराइल की सुरक्षा चिंता जैसे मुद्दे अभी भी अनसुलझे हैं। होर्मुज खुला, लेकिन नाजुक हालात बरकरार शीर्षक से जारी रिपोर्ट में कहा गया, पोत परिवहन, बीमा, बंदरगाह और परिचालन संबंधी बाधाएं भी संघर्ष से पहले की स्थिति में लौटने में देरी कर सकती हैं। एसएंडपी ने 2026 बची हुई अवधि के लिए ब्रेंट की कीमत का अनुमान औसतन 110 डॉलर प्रति बैरल बनाए रखा है।
इसके 2027 में कम होकर 80 डॉलर प्रति बैरल और 2028 में 65 डॉलर प्रति बैरल पर रहने की संभावना जतायी गयी है। एसएंडपी ग्लोबल रेटिंग्स में एशिया-प्रशांत क्रेडिट शोध की प्रमुख यूनिस टैन ने कहा,होर्मुज के फिर से खुलने से तत्काल बड़ा जोखिम कम हुआ है, लेकिन एशिया-प्रशांत क्षेत्र को अभी भी धीमी, महंगी और अधिक बिखरी हुई परिचालनगत स्थितियों का सामना करना पड़ रहा है। एमओयू के बाद ब्रेंट क्रूड की कीमत 80 डॉलर से नीचे आ गई है और तरलीकृत प्राकृतिक गैस जापान कोरिया मार्कर (एलएनजी जेकेएम) 15 डॉलर प्रति मिलियन ब्रिटिश थर्मल यूनिट (एमएमबीटीयू) के करीब है।एसएंडपी ने कहा कि इनसे शुरूआती झटके में कमी आई है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि बाजार दुरुस्त हो गया है।
आपूर्ति के प्रवाह में धीमी बहाली से पेट्रोरसायन, कृषि, परिवहन और लॉजिस्टिक में ऊर्जा, माल ढुलाई और कच्चे माल की लागत का दबाव बना रह सकता है। सबसे ज्यादा जोखिम ऊर्जा, विपणन क्षेत्र और कम बाहरी तथा राजकोषीय बफर वाले उभरते बाजारों को है। होर्मुज जलडमरूमध्य से प्रसंस्कृत ईंधन, नाफ्था, उर्वरक और औद्योगिक कच्चे माल का भी परिवहन होता है, इसलिए धीमी आवाजाही का असर ऊर्जा के अलावा अन्य क्षेत्रों पर भी हो सकता है। एसएंडपी ने कहा कि दक्षिण एशिया विशेष रूप से पश्चिम एशिया संघर्ष के दूसरे स्तर के जोखिमों के प्रति संवेदनशील है।
भारत दुनिया का सबसे बड़ा यूरिया आयातक है और खाड़ी देशों के आपूर्तिकर्ता पर बहुत अधिक निर्भर है जबकि बांग्लादेश और दूसरे देश आयातित उर्वरक और गैस से जुड़े नाइट्रोजन उत्पादन पर निर्भर हैं। एसएंडपी ने कहा, उत्तरी अफ्रीका, रूस, चीन या अधिक लागत वाले यूरोप से वैकल्पिक आपूर्ति मदद कर सकती है, लेकिन यह प्रक्रिया धीमी और महंगी होगी।
अगर उर्वरक की कमी और खराब मौसम की स्थिति एक साथ आ जाए, तो इसका असर तेजी से फसल उत्पादन, खाने-पीने की चीजों की कीमतों, लोगों की खरीदने की क्षमता और सब्सिडी के बोझ पर पड़ सकता है। टैन ने कहा, केंद्रीय बैंकों के सामने एक मुश्किल स्थिति है। मौद्रिक नीति को कड़ा करने से महंगाई और मुद्रा की कीमत में गिरावट को रोकने में मदद मिल सकती है, लेकिन इससे वृद्धि पर असर पड़ेगा। वहीं, अगर वे कोई बदलाव नहीं करते हैं, तो मुद्रा और पूंजी प्रवाह पर अधिक जोखिम बना रह सकता है।





