जीवन की बाधाएं, भय, नकारात्मक शक्तियां और कष्ट दूर होते हैं
लखनऊ। हिंदू धर्म में कालाष्टमी भगवान शिव के उग्र एवं रक्षक स्वरूप काल भैरव को समर्पित मानी जाती है। प्रत्येक माह कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को कालाष्टमी व्रत रखा जाता है, लेकिन जब यह व्रत अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) में आता है तो इसका महत्व कई गुना बढ़ जाता है। मान्यता है कि इस दिन विधिपूर्वक व्रत, पूजा और काल भैरव जी का स्मरण करने से जीवन की बाधाएं, भय, नकारात्मक शक्तियां और कष्ट दूर होते हैं। अष्टमी तिथि का प्रारंभ: 8 जून 2026, सोमवार को सुबह 03:24 बजे अष्टमी तिथि की समाप्ति: 9 जून 2026, मंगलवार को सुबह 03:23 बजे, ऐसे में अधिक कालाष्टमी का व्रत 8 जून को रखा जाएगा।
कालाष्टमी व्रत का शुभ मुहूर्त 2026
शास्त्रों में कालाष्टमी व्रत की पूजा प्रदोष काल में बताई गई है। ऐसे में इस दिन प्रदोष काल शाम 6 बजकर 30 मिनट से शुरू हो रहा है और शाम को 7 बजकर 30 मिनट तक रहेगा। इस बीच में हम पूजा- अर्चना कर सकते हैं।
अधिक मास कालाष्टमी का धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार काल भैरव भगवान शिव के ऐसे स्वरूप हैं जो धर्म की रक्षा करते हैं और भक्तों को संकटों से बचाते हैं। अधिक मास की कालाष्टमी पर काल भैरव की पूजा करने से व्यक्ति को शत्रु बाधा, ग्रह दोष, अकाल भय और नकारात्मक प्रभावों से मुक्ति मिलने की मान्यता है। इस दिन व्रत रखने और रात्रि में भैरव मंत्रों का जाप करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। काल भैरव को काल के रक्षक माना गया है। ऐसी मान्यता है कि उनकी पूजा से भक्तों को अकाल मृत्यु से रक्षा मिलती है और जीवन में सुरक्षा व स्थिरता बनी रहती है।
कालाष्टमी पूजा विधि
सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और काल भैरव के सामने व्रत का संकल्प लें। शाम को या रात में घर के मंदिर में या मंदिर जाकर भगवान भैरव की फोटो/मूर्ति को स्थापित करें। उन्हें गंगाजल, दूध, दही, शहद और घी से अभिषेक कराएं। कुंकुम, चंदन, काले तिल, फूल, और इमरती या जलेबी का भोग लगाएं। सरसों के तेल का दीपक जलाएं। भैरव चालीसा का पाठ करें और अंत में आरती उतारें, और प्रसाद ग्रहण करें।





