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राज्यपाल कर्तव्य में विफल रहते हैं तो क्या चुप रहें : सुप्रीम कोर्ट

गवर्नर, राष्ट्रपति की विधेयक मंजूरी की समयसीमा निर्धारण पर फैसला सुरक्षित


नयी दिल्ली । सुप्रीमकोर्ट ने राष्ट्रपति संदर्भ पर 10 दिन तक दलीलें सुनने के बाद बृहस्पतिवार को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। न्यायालय ने फैसला सुरक्षित रखते हुए पूछा कि यदि राज्यपाल जैसे संवैधानिक पदाधिकारी अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने में विफल रहते हैं तो क्या वह निष्िक्रय बैठ सकता है। राष्ट्रपति संदर्भ में पूछा गया था कि क्या एक संवैधानिक अदालत राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों को मंजूरी देने के लिए राज्यपालों और राष्ट्रपति के लिए समयसीमा निर्धारित कर सकती है।

इस संदर्भ पर 10 दिन तक चली मैराथन सुनवाई में चीफ जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रमनाथ, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस एएस चंदुरकर की संविधान पीठ ने अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी,सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, अभिषेक सिंघवी, गोपाल सुब्रमण्यम, अरविंद दातार और अन्य सहित कानूनी दिग्गजों की दलीलें सुनीं और फैसला सुरक्षित रख लिया।

दलीलों के अंतिम दिन कोर्ट ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को उस समय टोका जब उन्होंने शक्तियों के पृथक्करण को संविधान की मूल संरचनाओं में से एक बताया और कहा कि न्यायालय को समयसीमा तय नहीं करनी चाहिए और राज्यपालों की विवेकाधीन शक्तियों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। चीफ जस्टिस ने कहा, ‘कोई भी व्यक्ति चाहे कितने भी ऊंचे पद पर क्यों न हो, संविधान के संरक्षक (सुप्रीम कोर्ट का संदर्भ) के रूप में।

मैं सार्वजनिक रूप से कहता हूं कि मैं शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत में दृढ़ विश्वास रखता हूं और यद्यपि न्यायिक सक्रियता होनी चाहिए, लेकिन न्यायिक अतिवाद या दुस्साहस नहीं होना चाहिए। लेकिन साथ ही, यदि लोकतंत्र का एक पक्ष अपने कर्तव्य का निर्वहन करने में विफल रहता है, तो क्या संविधान का संरक्षक शक्तिहीन होकर निष्कर्ष बैठा रहेगा?’ मेहता ने कहा, ‘केवल न्यायालय ही नहीं, कार्यपालिका भी नागरिकों के मौलिक अधिकारों की संरक्षक है। विधायिका भी संरक्षक है, तीनों अंग संरक्षक हैं।

न्यायालय राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा संदर्भित 14 प्रश्नों पर संभवतः अपनी राय देगा, जिसमें यह भी शामिल है कि क्या संवैधानिक प्राधिकारी विधेयकों पर अनिश्चितकाल तक स्वीकृति रोक सकते हैं और क्या न्यायालय अनिवार्य समयसीमा लागू कर सकते हैं। ये मुद्दे मूलतः अनुच्छेद 200 से संबंधित हैं, जो राज्य विधानमंडल द्वारा पारित विधेयकों के संबंध में राज्यपाल की शक्तियों को नियंत्रित करता है।

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