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कब तक कलम होती रहेगी हिन्दुस्तान की साख

साऊदी अरब में दो भारतीयों के सिर कलम कर दिए गए और इसकी अधिकृत सूचना इनके परिजनों को भारत के विदेश मंत्रालय ने करीब पौने दो महीने बाद तब दी,जब मृतकों के परिजनों ने इसके लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया। हो सकता है इन दोनों भारतीयों ने वाकई इतना गंभीर अपराध किया हो कि उन्हें इससे कम सजा देने की सऊदी अरब के संप्रभु कानून में कोई गुंजाइश ही न रह गयी हो?

हो सकता है,उन्हें इसके लिए किसी भी कीमत पर माफ ही न किया जा  सकता रहा हो या कि इससे कम सजा ही न दी जा सकती रही हो? लेकिन क्या शवों के साथ भी सम्मान और शिष्टता न बरते जाने की किसी देश का कानून वकालत कर सकता है? किसी देश के कानून को इसकी इजाजत तभी मिलती है जब प्रभावित व्यक्ति या देश की कोई हैसियत न हो, तो क्या हम मानें की सुपर पॉवर बनते भारत की दिनोंदिन बढ़ती हैसियत का हम लोगों ने जो खाका खींच रखा है,वह महज एक भ्रम है? क्या वह सब एक दिवास्वप्न है?

क्या हम यह भ्रम पालकर हम खुद छल रहे हैं और हमसे भ्रम पलवाकर नेता अपना हित साध रहे हैं? अगर यह सच नहीं है तो फिर क्या है? क्या यही है हमारी वैश्विक हैसियत कि हमारे दो नागरिकों का अपने कानून के मुताबिक सिर कलम करने के बाद भी,सऊदी अरब यह स्पष्ट नहीं कर रहा कि मृत व्यक्तियों के शव उनके भारतीय परिजनों को दिए जायेंगे या नहीं? माना कि उसके कानून में यह सुविधा नहीं है लेकिन क्या चीन या अमरीका के किसी नागरिक के साथ दुनिया का कोई भी देश भले उसका कानून कुछ भी कहता हो, ऐसी हरकत कर सकता है?

खूब गला फाड़ फाड़कर कहा जा रहा है कि हमारे प्रधानमंत्री जी ने हमारी एक सुपर पॉवर होते देश की वैश्विक छवि बना दी है। कहा जा रहा है कि पूरी दुनिया के देश उनका सम्मान करने को उत्सुक हैं,लालायित हैं। कहा जा रहा है कि उनके कुछ कहे जाने की आज एक वैश्विक आवाज हे। अगर वाकई यह सब सच है तो फिर सऊदी अरब इतनी धृष्टता क्यों कर रहा है? वह सऊदी अरब जिसकी कायापलट में 30 लाख से ज्यादा भारतीय लगे हुए हैं। जिस सऊदी अरब के साथ निरंतर भारत के सम्बन्धों के प्रगाढ़ होने की बात कही जा रही है?

अभी पिछले दिनों जब भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव चरम पर था तो कहा जा रहा था कि उस तनाव को कम करने में सऊदी अरब की मध्यस्थता ने एक अहम भूमिका निभाई है? माना जा रहा था कि यह सब हमारी हालिया मोदी डाक्ट्रिन का कमाल है। उन दिनों मोदी जी और प्रिंस सलमान की गले मिलती तस्वीरों को मीडिया में बार बार फ्लैश किया गया था। लेकिन आज इस हकीकत के सामने उतनी तो छोड़िये क्या कहीं रत्तीभर भी हमारी हैसियत दिखती है कि हम सऊदी अरब से बिना लड़खड़ाये स्वर में कहें कि हमारे दोनों नागरिकों के शव सम्मान के साथ हमें सौंपे जाएं?

जिन दो भारतीयों के सऊदी अरब में भारतीय दूतावास को भी बिना बताये, जैसा कि मीडिया के जरिये सामने आया है, सिर कलम किये गए हैं उन दोनों का भारतीय पंजाब से रिश्ता था। ये दोनों हिन्दुस्तानी वहां वर्क परमिट पर काम कर रहे थे। इन दोनों की मौत की अब यानी गुजरे 15 अप्रैल को पुष्टि करते हुए भारतीय विदेश मंत्रालय ने अपने एक पत्र में कहा है कि होशियारपुर के सतविंदर और लुधियाना के हरजीत सिंह को 28 फरवरी को मौत की सजा दी गई। आश्चर्य की बात देखिये कि सतविंदर के परिवार वालों ने कहा है कि उनकी सतविंदर से 21 फरवरी 2019 को बात हुई थी, तब तक सतविंदर को भी नहीं पता था कि उसे क्या सजा मिली है?

हद तो यह है कि जिस विदेश मंत्रालय ने दोनों भारतीयों की मौत की अब जाकर पुष्टि की है,उस मंत्रालय ने भी पहले मृतकों के परिजनों को किसी भी प्रकार कि कोई सूचना नहीं दी। एक तरह से कहना चाहिए कि विदेश मंत्रालय ने अपनी तरफ से सम्पर्क भी नहीं किया। मृतकों के परिजनों को तो सऊदी अरब में ही रह रहे कुछ लड़कों ने बताया था। मृतकों के परिजन तो अभी भी नहीं पता कि उन्हें उनके शव मिलेंगे या नहीं? वह बस यही कहते हैं, ‘अब तो बस भगवान का ही सहारा बचा है।’

सवाल है जब दोनों भारतीयों को 28 फरवरी को ही सजा-ए- मौत हो गयी थी तो विदेश मंत्रालय ने इसका खुलासा बीते 15 अप्रैल को क्यों किया? वह भी तब जब उस पर अदालत का दबाव डाला गया? क्या उसे भी तब तक पता नहीं था? अगर पता था तो क्या उसे इसकी इतनी भी संवेदना नहीं थी? अगर मृतकों के परिजनों से सऊदी अरब से 28 फरवरी को ही सम्पर्क किया जाता है तो क्या सऊदी ने भारत सरकार के विदेश मंत्रालय से इस तारीख को भी सूचना साझा नहीं किया था? अगर यह सच है तो हमें अपने वैश्विक प्रभाव के बारे में दुबारा सोचना चाहिए। मृतकों के परिजनों के मुताबिक जब उन्होंने इस संबंध में हिन्दुस्तान के विदेश मंत्रालय से बातचीत की तो उन्हें इसका पता भी नहीं था।

आखिर यह कैसी सजगता है? मृतकों के परिजनों को हाईकोर्ट में एक याचिका दायर करनी पड़ी और यह मांग करनी पड़ी कि कोर्ट विदेश मंत्रालय को इन व्यक्तियों के बारे में जानकारी पता करने के लिए कहे। शायद इसीलिये 15 अप्रैल को मंत्रालय ने एक मेल करके मौत की पुष्टि कर दी है। गौरतलब है ये दोनों भारतीय सऊदी अरब में ड्राइवर थे। साल 2013 में होशियारपुर के सतविंदर कुमार और लुधियाना के हरजीत सिंह वर्क परमिट पर सऊदी अरब गए थे। कहा जा रहा है कि दिसंबर 2015 में उन्हें आरिफ की हत्या के मामले में गिरμतार किया गया था। हालांकि यह भी कहा जा रहा है कि उन्हें सजाए-मौत इसके लिए नहीं दी गयी।

दरअसल जब उनकी सजा पूरी हो गई तो प्रत्यर्पण के दौरान पता चला कि हत्या के एक और मामले में पुलिस को उनकी तलाश है। इस मामले की सुनवाई के लिए उन्हें रियाद की जेल में स्थानांतरित किया गया। बाद में इसी मामले में उन्हें मौत की सजा दी गयी। विदेश मंत्रालय का कहना है कि सऊदी अरब के कानून के मुताबिक मौत की सजा पाए व्यक्ति के शव को न तो परिजनों को ही सौंपा जा सकता है और न ही मृतक के देश को लौटाया जा सकता है। दो महीने बाद ही मृत्यु प्रमाण जारी होगा। फिर हमारी हैसियत का क्या फायदा? पूरी दुनिया का इतिहास गवाह है कि कूटनीति में कोई स्थायी कानून नहीं होता। कूटनीति के कानून वक्त और परिस्थितियों के हिसाब से बनते हैं। क्या दुनिया में वाकई हमारा वक्त और परिस्थितियां हैं?

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