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परिश्रम से मिलता है फल

सफलता के लिए हमे परिश्रम करना पड़ता है। बिना परिश्रम के सफलता का फल कभी किसी को नहीं मिल सकता है। संसार में हर वस्तु मूल्य देकर खरीदी जाती है। मुफ्त में सड़क पर पड़ा कूड़ा-करकट ही कोई समेट सकता है। बहुमूल्य मोती बीनने वाले को समुद्र की तली में गहरे गोते लगाने पड़ते हैं। इतना ही नहीं सफल गोताखोर बनने के लिए उस कला की बारीकियां समझने और प्रवीणता प्राप्त करने के लिए मुद्दतों का समय लग जाता है। कहा जाता है कि साधना बारह वर्ष में पूरी होती है।

तब इस योग्य बनती है कि अभीष्ट सफलता के दर्शन हो सकें। यह बात आध्यात्मिक साधनाओं के लिए नहीं सांसारिक प्रयोजनों की पूर्ति के लिए समान रूप से सही है। कलाकार संगीतकार, गायक, वादक, बनने के लिए जो महीने पन्द्रह दिन का समय पर्याप्त समझते हैं वे भूल करते हैं। साधक को कई मंजिलें पार करनी पड़ती हैं। उसमें सबसे पहली कठिनाई है चित्त की ऊब से निपटना।

बाल बुद्धि में अस्थिरता होती है वह अधिक देर किसी काम पर नहीं टिकती। बच्चे अभी बालू का महल बनाते हैं। वह बन नहीं पाता कि टहनियां तोड़कर बगीचा लगाना आरम्भ कर दे हैं। वह भी जब तक पूरा नहीं हो पाता कि तीसरा आरम्भ करते हैं और फिर चौटे, पांचवे का सिलसिला चला देते हैं। मन की उतावली चाहती है कि जिस प्रकार चिंतन में जल्दबाजी मची रहती है उसी उतावली से काम भी बनते चले जायें। पानी के बबूले उठते तो बहुत जल्दी हैं पर उन्हें फूटने में भी देर नहीं लगती।

यह खेल खिलवाड़ की दृष्टि से तो ठीक है पर महत्वपूर्ण कार्यों के लिए जितना श्रम और समय चाहिए उसे देखते हुए उतावली का कोई मूल्य नहीं है। शेख चिल्ली की कहानी सभी ने सुनी होगी। वह तेल की मजूरी के मिलने से पहले ही मुर्गी-मुर्गी से बकरी-बकरी से भैंस-भैंस से मकान-मकान से बीबी-बीबी के बच्चे होने की योजना बनाने लगा था। उतावली इतनी थी कि तेल का घड़ा सिर से गिर गया और मजूरी मिलना तो दूर मालिक को जुर्माना देना पड़ा।

यह कहानी सच न भी हो तो भी हममे से अधिकांश के ऊपर लागू होती है। जो योजनाएं तो बड़ी-बड़ी बनाते हैं और आकर्षक भी, पर उन्हें पूरा करने क लिए जिस एकाग्रत, श्रमशीलता एवं धैर्य की आवश्यकता है उनमें से एक भी संजोते नहीं, सफलता चाहते हैं। पर साथ ही इस बात के लिए भी व्याकुल रहते हैँ कि उसके लिए निरन्तर अभ्यास न करना पड़े अ‍ैर जब हथेली पर सरसों नहीं जमती तो अधीर हो जाते हैं। उ

स निराशा में जो कर रहे थे उसे छोड़ बैठते हैं और फिर कोई नया काम अपनाते हैं। उसमें भी देर तक मन नहीं लगता और इस प्रकार एक के बाद दूसरे अधूरे काम छोड़ते और उन असफलताओं का दोष जिस-तिस पर लगाते हुए भाग्य को कोसते हैं।

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