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पापों से मुक्ति दिलाने वाली गंगा सप्तमी कल

गंगा स्नान, पूजा-पाठ, ध्यान और दान करने का विशेष महत्व
लखनऊ। हिंदू धर्म में मां गंगा का विशेष स्थान होता है। मां गंगा को सबसे पवित्र, मोक्षदायिनी और अमृततुल्य माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सभी तरह के शुभ कार्य में गंगाजल का प्रयोग अवश्य किया जाता है और गंगा स्नान से व्यक्ति के जीवन भर के पापों से मुक्ति मिल जाती है। हिंदू पंचांग के अनुसार हर वर्ष वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को गंगा सप्तमी का पर्व मनाया जाता है। इस बार गंगा सप्तमी 14 मई को मनाई जाएगी। गंगा सप्तमी को गंगा स्नान, पूजा-पाठ, ध्यान और दान करने का विशेष महत्व होता है। ऐसी मान्यता है भगवान शिव ने मां गंगा के वेग को कम करने के लिए अपनी जटाओं में धारण किया है। धार्मिक मतानुसार गंगा सप्तमी के दिन ही मां गंगा स्वर्ग लोक से भगवान शिव की जटाओं में स्थान प्राप्त किया था। इस कारण से गंगा सप्तमी का त्योहार मनाया जाता है।

गंगा सप्तमी पूजा महत्व
हिंदू धर्म गंथ्रों में मां गंगा का विशेष स्थान होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गंगा पूजन और स्नान करने से समस्त पापों का क्षय होता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसी कारण से धर्म ग्रंथों में गंगा नदी को मोक्षदायनी कहा गया है। मान्यता है कि इस दिन गंगा पूजन से ग्रहों का अशुभ प्रभाव कम होता है। गंगा सप्तमी के दिन भगवान विष्णु और भगवान शंकर की भी विधिवत पूजा होती है। भगवान शंकर का गंगा जल से अभिषेक करने पर शिवजी और गंगा मैया की कृपा प्राप्त होती है मान्यता है कि गंगा मैया के पावन जल के छींटे मात्र शरीर पर पड़ने से जन्म-जन्मांतर के पाप दूर हो जाते हैं। गंगा पूजन व स्नान करने से सुखों की प्राप्ति होती है।

गंगा सप्तमी पौराणिक कथा
पौराणिक शास्त्रों के अनुसार वैसाख मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि के दिन मां गंगा स्वर्गलोक से भगवान शिवजी की जटाओं में पहुंची थीं। इसी कारण से इस दिन को गंगा सप्तमी के रूप में मनाया जाता है। दरअसल जब राजा सगर ने युद्ध में अपने सभी पुत्रों का खो दिया था और तब अपने सभी पुत्रों को मोक्ष दिलाने के लिए कठोर तप करते हुए स्वर्गलोक से मां गंगा को धरती पर अवतरित होने सी प्रार्थना की थी। लेकिन गंगा का वेग इतना तेज था कि वह पृथ्वी पर आने की स्थिति में नहीं थी क्योंकि गंगा के वेग से समूची पृथ्वी का संतुलन बिगड़ जाता है। तब भगवान शिव ने अपनी जटाओं में गंगा को धारण करके उनके वेग को नियंत्रित करते हुए धरती पर अवतरित हुई थीं। भगवान शिव से जब अपनी जटाओं में मां गंगा को धारण किया था तब वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि थी।

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