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घाटी में विदेशी राजनयिक

भारत सरकार पाकिस्तान की प्रोपेगंडा मशीनरी को बेनकाब करने के लिए हमेशा सक्रिय रही है और यही कारण है कि चाहे संयुक्त राष्ट्र संध में पाकिस्तानी राजदूत मलिहा लोदी के द्वारा फिलीस्तीन में हिंसा का फोटो दिखाकर कश्मीर का बताने की बात हो या फिर खूंखार आतंकियों को संरक्षण देने की बात, भारत ने पुख्ता सबूतों के सहारे हर मंच पर पाकिस्तान के तर्कों, कुतर्कों, अफवाहों और दुष्प्रचार को अपने राजनयिक कौशल से भोंथरा करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है।

कश्मीर पर एक बार फिर भारत ने पाकिस्तान के तमाम दुष्प्रचार को तार-तार करने के लिए यूरोपीय यूनियन के राजदूत उगो एस्टडो की अगुवाई में 20 देशों के 24 राजनयिकों को कश्मीर यात्रा पर बुलाया है ताकि दुनियाभर के राजनयिक कश्मीर के वास्तविक हालात का स्वयं मौका-ए- मुआयना करके अपने-अपने देशों के साथ ही पूरी दुनिया को बता जमीनी हालात बता सकें।

कश्मीर का दौरा करने के बाद अपने-अपने देशों को और दुनिया को जो तथ्य ये राजनयिक बतायेंगे, उसी पर दुनिया भरोसा भी करेगी। अब भले ही पाकिस्तान या फिर मोदी सरकार से खार खाये बैठे विपक्षी दल इसको प्रायोजित बतायें लेकिन इन राजनीतिक आलोचनाओं का कूटनीतिक महत्व नहीं है। हां इसके जरिए अगर कोई पार्टी अपने मतदाता समूह को साधना चाहती है तो हमारे लोकतंत्र एवं संविधान में इसकी छूट है, लेकिन आजादी के बाद से ही इस राजनीतिक मर्यादा का हमेशा पालन किया गया है कि अंतर्राष्ट्रीय मामलों पर या फिर सुरक्षा संबंधी मामलों पर पूरा देश दलीय सीमाओं से ऊपर उठकर एक सुर में बोलता है।

अब कोई दल निहित राजनीतिक स्वार्थ के तहत अंतर्राष्ट्रीय एवं सुरक्षा संंबंधी मुद्दों पर राजनीति करती है तो फिर उसके बारे में फैसला करने का अधिकार मतदाता को है। जहां तक यूरोपीय यूनियन के राजदूत उगो एस्टडो सहित चिली, ब्राजील, क्यूबा, बोलिविया, एस्टोनिया, फिनलैंड, फ्रांस, आयरलैंड, नीदरलैंड्स, पुर्तगाल, बेल्जियम, स्पेन, स्वीडन, इटली, बांग्लादेश, मलावी, इरिट्रिया, आईवरी कोस्ट, घाना, सेनेगल, मलेशिया, ताजिकिस्तान, किर्गिस्तान के राजनयिकों के दौरे की बात है तो कश्मीर पर दुनिया को समझाने का यह भारत का मास्टर स्ट्रोक है।

ये चौबीस राजनयिक जम्मू-कश्मीर की राजधानी श्रीनगर पहुंच गये हैं और वहां के स्थानीय लोगों, पत्रकारों और डीडीसी के लिए निर्वाचित प्रतिनिधियों से विचार-विमर्श कर हालात की समीक्षा करेंगे। गौरतलब है कि सरकार कश्मीर में धारा 370 हटाने के बाद से ही विदेशी राजनयिकों को जाने की इजाजत दे रही है और इसी कड़ी में यह चौथा अवसर है जब राजनयिक कश्मीर पहुंचे हैं।

कश्मीर में डीडीसी चुनाव और कोरोना महामारी के बाद यह पहला दौरा है और अगर इतने संकट के बावजूद राजनयिक कश्मीर पहुंचे हैं तो इसके गहरे निहितार्थ हैं। पाकिस्तान कश्मीर को लेकर चाहे जितना प्रोपेगंडा खड़ा करे लेकिन कश्मीर में चुनाव होना, केसर की खेती बढ़ना, पर्यटकों का पहुंचना और फिल्मों की शूटिंग फिर से शुरू होना इस बात का प्रमाण है कि कश्मीर की फिजां अब बदल रही है।

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