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33 सालों से मूर्तिकार पिता की मूर्ति लेने के लिए परेशान परिजन

वरिष्ठ संवाददाता लखनऊ। जिस मूर्तिकार की उंगलियों के जादू ने न जाने कितनी कलाकृतियों को गढ़कर लोगों से वाहवाही बटोरी होगी और न जाने कितने प्रशस्ति पत्र और सम्मान पाए हो, उस जाने माने मूर्तिकार के घर वाले उनके निधन के बाद लखनऊ विश्वविद्यालय में उपेक्षा का शिकार हो रही उन मूर्तियों को अंतिम निशानी के तौर पर वापस लेने के लिए पिछले 33 सालों से चक्कर लगा रहे हैं लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन के कान में जूं नहीं रेंग रही है।

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (ललित कला संकाय) में मूर्ति कला विभाग में रीडर रहे स्व. दिनेश प्रताप सिंह के परिजन वाराणसी में रहते हैं। उनका लखनऊ विश्वविद्यालय के आर्ट्स कालेज में पेंटिग में दाखिले के बाद जब उनके पिता को श्रीधर महापात्र की मूर्तिकला देखने का अवसर मिला। तो उन्होंने बाद में मूर्तिकला में दाखिला ले लिया। अपनी विलक्षण प्रतिभा और विनम्र स्वभाव की वजह से गुरूओं और छात्रों में बेहद प्रिय रहे दिनेश प्रताप सिंह को उनकी लगभग सभी कलाकृतियों को अवार्ड मिलते रहे।

यहां तक कि तत्कालीन मुख्यमंत्री सूचेता कृपालानी ने उन्हें इसके लिए सम्मानित किया। उस दौरान हर समाचार पत्र में उनकी मूर्ति कला के चर्चे होते रहे। स्वाभिमानी और ईमानदार व्यक्तित्व के धनी दिनेश प्रताप सिंह ने अपनी कलाकृति को कभी बेचने का प्रयास नहीं किया। इसी के चलते उन्होंने समुद्र मंथन समेत अन्य मूर्तियों की एक कला प्रदर्शनी भी लखनऊ विश्वविद्यालय में लगाई। इसके बाद कई साल तक मूर्तियां वहीं पड़ी रही। इस बीच वह बीएचयू मेंं नौकरी करने लगे लेकिन वहां भी उनकी मूर्ति कला का काम चलता रहा। यहां उन्हे खजुराहो फेस्टिवल में भी आमंत्रित किया गया।

इस बीच 11 मार्च 1990 को उनका निधन हो गया। निधन के बाद से उनकी पत्नी और बेटियां लगातार लखनऊ विश्वविद्यालय के चक्कर लगा रहे हैं। इस सम्बन्ध में न जाने कितने मंत्रियों और विभागों को अपने पति की मूर्तियों को वापस लेने के लिए घर वाले प्रार्थना पत्र दे चुके हैं। मुख्यमंत्री हेल्पलाइन पर भी प्रार्थनापत्र दिया जा चुका है लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन लगातार उन्हे टरकाने का काम कर रहा है। संकाय प्रमुख रतन कुमार को भी मूर्तियों को वापस देने के लिए तैयार नहीं है। जबकि स्व. दिनेश प्रताप सिंह के घर वालों के इसके अधिकार के कई प्रमाण मौजूद हैं।

इस सम्बन्ध में मूर्तिकार स्व. दिनेश प्रताप सिंह की पुत्री रेखा सिंह का कहना है कि सन 1986 में उनके पिता ने बीएचयू में रहते हुए अपनी तीन मूर्तियों को मांग की थी, इसके बाद उनका 1990 में निधन हो गया। इसके बाद से ही मूर्ति विश्वविद्यालय से लेने के लिए लगे रहे। 1994 में कला शिल्पा महाविद्यालय के तत्कालीन प्राचार्य रधुनाथ महापात्र ने वात्साल्य मूर्ति दे दी चूकिं आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी इसलिए सागर मंथन और अवधी बड़ी मूर्ति नहीं ले जा सकें।

आवेदन के बावजूद नहीं मिला जवाब

रेखा सिंह ने बताया कि आटर््स कालेज के डीन रतन कुमार को 21 अप्रैल 2023 को आवेदन किया फिर 8 मई 2023 को रिमान्डर दिया लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। इसके बाद सीएम पोर्टल पर आवेदन किया, तब कार्रवाई शुरू हुई।

रतन कुमार ने मांगी जायेगी जानकारी

इस सम्बन्ध में लविवि प्रवक्ता डॉ. दुर्गेश श्रीवास्तव ने बताया कि इस बारे में उनके पास कोई जानकारी नहीं है। इसकी जानकारी कला संकाय के अध्यक्ष रतन कुमार से मांगी जायेगी।

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