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मोहिनी एकादशी व्रत 27 को, भक्त करेंगे श्रीहरि की आराधना

इस व्रत को करने से भगवान विष्णु की कृपा मिलती है
लखनऊ। वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मोहिनी एकादशी कहा जाता है। इस दिन भगवान ने देवताओं को अमृत पिलाने के लिए और राहु को अमृत पिलाने से बचाने के लिए मोहिनी रुप धरा था। जिसके बाद राहु और केतु अमृत पी नहीं पाएं और छल से सभी देवताओं को अमृत पिला दिया। सभी पापों को क्षय करके इस व्रत को करने से भगवान विष्णु की कृपा मिलती है। ये एकादशी व्रत सतयुग से चला आ रहा है। इस व्रत को सतयुग में कौटिन्य मुनि ने इस व्रत के बारे में शिकारी को बताया था, फिर द्वापर युग में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को इस व्रत के बारे में बताया। तब से मोहिनी एकादशी व्रत चला आ रहा है। इसके बाद त्रेतायुग में महर्षि वशिष्ठ ने भगवान राम को इस व्रत का महत्व बताया । इस साल व्रत 27 अप्रैल को रखा जाएगा।

मोहिनी एकादशी का महत्व
इस दिन भगवान विष्णु के अवतार प्रभु श्री राम एवं विष्णुजी के मोहिनी स्वरूप का पूजन-अर्चन किया जाता है। पदम् पुराण के अनुसार भगवान श्री कृष्ण,युधिष्ठिर को मोहिनी एकादशी का महत्व समझाते हुए कहते हैं कि महाराज !त्रेता युग में महर्षि वशिष्ठ के कहने से परम प्रतापी श्री राम ने इस व्रत को किया। यह व्रत सब प्रकार के दुखों का निवारण करने वाला,सब पापों को हरने वाला व्रतों में उत्तम व्रत है। इस व्रत के प्रभाव से प्राणी भगवान विष्णु की कृपा से सभी प्रकार के मोह बंधनों एवं पापों से छूट कर अंत में वैकुण्ठ धाम को जाते हैं।

मोहिनी एकादशी कथा

शास्त्रों के अनुसार,सरस्वती नदी के पास भद्रावती नाम का एक सुन्दर नगर था। राजा धृतिमान जो भगवान विष्णु के परम भक्त थे,इस स्थान पर शासन करते थे। उनके पाँच पुत्र थे, जिनमें से पांचवां पुत्र जिसका नाम धृष्टबुद्धि था,बहुत बुरे कामों और अनैतिक कार्यों में शामिल होने वाला पापी था। यह सब देखकर राजा धृष्टिमन ने धृष्टबुद्धि का त्याग कर दिया। जीवित रहने के लिए,वह डकैती के कृत्यों में शामिल हो गया। परिणामस्वरूप,उसे राज्य से बाहर निकाल दिया गया। धृष्टबुद्धी एक जंगल में रहने लगा। एक बार जब वह जंगल में भटक रहा था,तो वह ऋषि कौंडिन्य के आश्रम में पहुंचा। यह वैशाख मास का समय था और ऋषि कौंडिन्य स्नान कर रहे थे। कुछ बूंदें निकल गयीं और धृष्टबुद्धि पर पड़ गयीं। इस वजह से धृष्टबुद्धि ने आत्म-साक्षात्कार और अच्छी भावना को प्राप्त किया और इस तरह उसने अपने सभी अनैतिक कार्यों पर पछतावा किया। उसने ऋषि से अपने पिछले पापों और बुरे कर्मों से मुक्ति के मार्ग की तरफ जाने के लिए मार्गदर्शन करने का अनुरोध किया। इसके लिए ऋषि ने उसे मोहिनी एकादशी व्रत का पालन करने के लिए कहा ताकि उसे पापों से छुटकारा मिल सके। एकादशी के दिन धृष्टबुद्धि ने पूरी श्रद्धा के साथ एकादशी व्रत रखा। व्रत के प्रभाव से उसके सभी पाप धुल गए और वह विष्णु लोक में पहुंच गया।

कैसे करें पूजा मोहिनी एकादशी की पूजा
एकादशी के दिन सबसे पहले सूर्योदय से पहले उठकर नहाएं। साफ कपड़े पहनें। इस दिन सबसे पहले पूजा का संकल्प लें। भगवान को चंदन अर्पित करें और भगवान की मूर्ति के सामने घी का दीपक जलाएं और व्रत का संकल्प लें। इस दिन भगवान के विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना चाहिए। भगवान विष्णु को पंचामृत और जल से मूर्ति का अभिषेक करें। भगवान विष्णु को पीले फूल और तुलसी पत्र चढ़ाएं। धूप, दीप से आरती करें। एकादशी व्रत के बाद रात में भजन कीर्तन करें। ऐसा कहा जाता है कि इस दो व्रत करता है, उसे बहुत पुण्य मिलता है। पुराणों में कहा गया है कि जो एकादशी के दिन व्रत करता है, उसे गौदान के बराबर फल मिलता है।

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