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घर-घर बाजत बधइया हो रामा, अवध नगरिया…

आॅनलाइन कार्यशाला में गूंजे चैती के सुर

लखनऊ। चैत्र मास के आगमन के साथ ही लोकगायन की पारंपरिक विधा चैती के मधुर स्वर वातावरण में गूंजने लगे हैं। इसी क्रम में लोक संस्कृति शोध संस्थान द्वारा गुरुवार को आॅनलाइन भजन एवं लोकगायन कार्यशाला का शुभारंभ किया गया। लोकसंगीत की समृद्ध परंपरा को संरक्षित करने तथा नई पीढ़ी को उससे जोड़ने के उद्देश्य से आयोजित यह कार्यशाला 18 मार्च 2026 तक चलेगी। कार्यशाला का संचालन दिल्ली विश्वविद्यालय के संगीत संकाय की सहायक आचार्य डॉ. स्मृति त्रिपाठी के निर्देशन में किया जा रहा है।
उद्घाटन सत्र में डॉ. त्रिपाठी ने प्रतिभागियों को चैती गायन की परंपरा, उसके भाव, लय, स्वर विन्यास तथा प्रस्तुति शैली की बारीकियों से परिचित कराया। उन्होंने कहा कि चैत्र मास में गाए जाने वाले चैती गीत लोकजीवन के उल्लास, ऋतु परिवर्तन और सामाजिक उत्सवों की अभिव्यक्ति हैं, जो विशेष रूप से अवध और पूर्वांचल की सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
संस्थान की सचिव डॉ. सुधा द्विवेदी ने बताया कि कार्यशाला के पहले दिन प्रतिभागियों को पारंपरिक चैती घर-घर बाजत बधइया हो रामा, अवध नगरिया तथा बधाई गीत अवधपुर बाजे आज बधइया का अभ्यास कराया गया। प्रशिक्षण के दौरान स्वर, आलाप, ताल और भावाभिव्यक्ति के साथ-साथ गीतों के सांस्कृतिक संदर्भों की भी जानकारी दी गई, जिससे प्रतिभागी लोकगायन की मूल आत्मा को समझ सकें। उन्होंने बताया कि इस कार्यशाला में देश-विदेश से जुड़े लगभग 45 प्रतिभागी आॅनलाइन माध्यम से प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं जिनमें लोकसंगीत के विद्यार्थी, शोधार्थी, कलाकार तथा लोकपरंपराओं में रुचि रखने वाले लोग शामिल हैं। उन्होंने बताया कि संस्थान का प्रयास है कि ऐसी कार्यशालाओं के माध्यम से लोकसंगीत की परंपराएं जीवंत बनी रहें और नई पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ी रहे।

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