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संभावनाओं का निर्माण

उल्लसित वर्तमान और उज्जवल भविष्य का निर्धारण पूर्णतया सत् श्रद्धा के हाथ में है। उसी का महत्व, मर्म, उपार्जन, अभिवर्द्धन सिखाने के लिए भूतकाल की कथा-गाथाओं को पुरातन उपाख्यानों में पुराण के नाम से जाना और जनाया जाता है। भूत भविष्य और वर्तामन की सुखद संभावनओं का निर्माण अंत:करण के जिस क्षेत्र से विनिर्मित होता है, उसका स्वरूप समझना हो तो एक श्रद्धा शब्द का उपयोग करने से वह प्रयोजन पूरा हो सकता है।

बीज ही वृक्ष बनता है और श्रद्धा ही व्यक्त्वि का रूप धारण करती है। मनुष्य जो कुछ बनता है- जो कुछ पाता है वह समूचा निर्माण श्रद्धा शक्ति के चमत्कार के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। यदि इस ब्रह्म विज्ञान के, आत्मविज्ञान के गूढ़ रहस्य को समझा जा सके तो प्रतीत होगा कि तत्वदर्शियों के वेदान्त प्रतिपादन सनातन सत्य की अयमात्मा ब्रह्म प्रज्ञानं ब्रह्म, तत्वमसि, सोहम, शिवोहम, सच्चिदानन्दोहम, आदि सूत्र में घोषित किया है।

पतन से बचने और उत्थान अपनाने का सुनिश्चित उपाय बताते हुए शस्त्रकार इस उत्तरदायित्व को मनुष्य के अपने कंधों पर ही लाद देते हैं, वे कहते हैं- उद्धरेत् आत्मनात्मानं अवसादयेत् अर्थात अपना उद्धार आप करो- अपने को गिराओ मत। उसका सुनिश्चित मत है कि उत्थान पतन की मुहिम हर मनुष्य स्वत: संभालता है।

परिस्थितियां तो उसका अनुगमन भर करती हैं। दिशा निर्धारण और प्रगति प्रयास अपना होता है। साधन और सहयोग तो उसी चुम्बकत्व के सहारे खिंचते भर चले आते हैं। उत्थान या पतन में से जो भी अपना मन्तव्य हो-व्यक्तियों, साधनों एवं परिस्थितियों का सरंजाम भी उसी स्तर का होता चला जाता है।

श्रद्धा की इसी गरिमा को देखते हुए अध्यात्म शास्त्र ने मानवी सत्ता में विद्यमान साक्षात् ईश्वरीय शक्ति के रूप में अभिवन्दन किया है। श्रद्धा वह प्रकाश है जो आत्मा की, सत्य की प्राप्ति के लिए बनाये गये मार्ग को दिखाता रहता है। जब भी मनुष्य एक क्षण के लिए लौकिक चमक-दमक, कामिनी और कंचन के लिए मोहग्रस्त होता है तो माता की तरह ठण्डे जल से मुंह धोकर जगा देने वाली शक्ति यह श्रद्धा ही होती है।

सत्य के सद्गुण ऐश्वर्य स्वरूप एवं ज्ञान की चाह अपनी बुद्धि से नहीं मिलती, उसके प्रति सविनय प्रेम भावना विकसित होती है। उसी को श्रद्धा कहते हैं। श्रद्धा सत्य की सीमा तक साधक को साधे रहती है, संभाले रहती है। श्रद्धा के बल पर ही मलिन चित्त अशुद्ध चिंतन का परित्याग करके बार-बार परमात्मा के चिंतन में लगा रहता है। बुद्धि भी जड़ पदार्थों में तन्मय न रहकर परमात्मा ज्ञान में अधिक से अधिक सूक्ष्मदर्शी होकर दिव्य भाव में बदल जाती है।

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