लखनऊ। हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत को बेहद पवित्र और फलदायी माना जाता है. यह व्रत भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना के लिए समर्पित होता है. मान्यता है कि इस दिन सच्चे मन से पूजा करने पर शिव कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है। हर महीने में दो बार प्रदोष व्रत रखा जाता है, जो त्रयोदशी तिथि को होता है। इस दिन भक्त सुबह से व्रत रखकर शाम के समय विशेष पूजा करते हैं।
वैदिक पंचांग के अनुसार, वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि की शुरूआत 15 अप्रैल को रात 12 बजकर 12 मिनट पर शुरू होगी, वहीं, इस तिथि का समापन 15 अप्रैल को रात 10 बजकर 31 मिनट पर होगा। ऐसे में 15 अप्रैल को प्रदोष व्रत किया जाएगा। शिव परिवार की विधि-विधान से आराधना करने के बाद व्रत का पारण किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, प्रदोष काल में पूजा करना विशेष रूप से शुभ माना गया है. ऐसे में हर भक्त यह जानना चाहता है कि अप्रैल माह का पहला और वैशाख महीने का पहला प्रदोष व्रत कब रखा जाएगा।
बुध प्रदोष व्रत का महत्व
प्रदोष व्रत भगवान शिव की विशेष कृपा पाने का एक श्रेष्ठ माध्यम माना जाता है. खासकर जब यह व्रत बुधवार के दिन पड़ता है, तो इसका महत्व और बढ़ जाता है. मान्यता है कि इस दिन सच्चे मन से व्रत और पूजा करने से भोलेनाथ भक्तों की हर मनोकामना पूरी करते हैं. प्रदोष व्रत का पुण्य प्रभाव जीवन के कष्टों और परेशानियों को दूर करता है. यह व्रत नकारात्मकता और पापों का नाश कर सुख, शांति और समृद्धि का मार्ग खोलता है. नियमित रूप से यह व्रत करने से व्यक्ति के जीवन में सौभाग्य और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
पूजा विधि
सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। घर के मंदिर और पूजा स्थान की साफ-सफाई करें। मंदिर में दीपक जलाएं। भगवान शिव का गंगाजल से अभिषेक करें। शिवजी को धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें। शिवलिंग पर कच्चा दूध चढ़ाएं। सायंकाल प्रदोष काल में भगवान शिव की विधिवत पूजा करें। शिवलिंग पर पुन: जलाभिषेक करें। प्रदोष व्रत की कथा पढ़ें या सुनें। शिवलिंग पर बेलपत्र, फूल, धतूरा, आक के फूल और भस्म अर्पित करें। प्रदोष व्रत के दिन कुछ खास नियमों का पालन करना बेहद शुभ माना जाता है। इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करने के बाद सूर्य देव को जल अर्पित करते हुए व्रत का संकल्प लें। इसके बाद अपने पूजा स्थान को साफ-सुथरा बनाएं और भगवान शिव का पंचामृत से अभिषेक करें. फिर पूरे शिव परिवार की विधिपूर्वक पूजा करें और शिवलिंग पर बेलपत्र, पुष्प, धूप और दीप अर्पित करें. पूजा के दौरान मन को शांत रखें और पूरी श्रद्धा के साथ प्रदोष व्रत की कथा का पाठ करें. अंत में भगवान शिव की आरती करें और शिव चालीसा का पाठ अवश्य करें. मान्यता है कि इस विधि से किया गया व्रत विशेष फलदायी होता है. पूजा पूर्ण होने के बाद ही अपना व्रत खोलें, जिससे व्रत का पूर्ण लाभ प्राप्त होता है।





