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रामपुर एमपी-एमएलए कोर्ट का बड़ा फैसला…इस मामले पर आजम खान को सुनाई दो साल की सजा, लगा जुर्माना

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की सियासत और कानूनी गलियारों से इस वक्त की सबसे बड़ी खबर रामपुर से आ रही है, जहां समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व कैबिनेट मंत्री आजम खान को अदालत से एक और करारा झटका लगा है। रामपुर की विशेष एमपी-एमएलए कोर्ट ने वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान तत्कालीन जिलाधिकारी (डीएम) के खिलाफ बेहद आपत्तिजनक, अमर्यादित और भड़काऊ टिप्पणी करने के मामले में आजम खान को दोषी ठहराया है। अदालत ने मामले की गंभीरता और गवाहों के बयानों को आधार मानते हुए सपा नेता को दो वर्ष के कारावास की सजा सुनाई है। इसके साथ ही माननीय न्यायालय ने उन पर पांच हजार रुपये का आर्थिक जुर्माना भी लगाया है। कानूनी जानकारों के मुताबिक, इस फैसले के बाद आजम खान की मुश्किलें आने वाले दिनों में और अधिक बढ़ सकती हैं, क्योंकि वे पहले से ही कई अन्य गंभीर मुकदमों में अदालती कार्रवाई और जेल की सजा का सामना कर रहे हैं।

जानिए क्या था आजम खान का विवादित बयान और पूरा मामला

यह पूरा विवाद वर्ष 2019 के आम चुनाव के दौरान का है, जब रामपुर संसदीय क्षेत्र में राजनीतिक दल जोर-शोर से चुनाव प्रचार में जुटे थे। इसी प्रचार अभियान के तहत रामपुर के भोट थाना क्षेत्र में समाजवादी पार्टी की ओर से एक विशाल जनसभा का आयोजन किया गया था। इस चुनावी मंच से जनता को संबोधित करते हुए आजम खान ने तत्कालीन जिलाधिकारी को सीधे निशाने पर लिया था। उन्होंने बेहद तल्ख लहजे में सार्वजनिक मंच से कहा था, “सब डटे रहो, यह कलेक्टर-पलेक्टर से मत डरियो। यह तनखैया हैं और तनखैयों से नहीं डरते। देखे हैं कई मायावती के फोटो, कैसे बड़े-बड़े अफसर रूमाल निकालकर जूते साफ कर रहे हैं। उन्हीं से गठबंधन है, उन्हीं के जूते साफ कराऊंगा इनसे, अल्लाह ने चाहा।” चुनावी सरगर्मी के बीच सरकारी तंत्र और जिले के सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी के खिलाफ दिए गए इस तीखे बयान का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया था, जिसके बाद प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में हड़कंप मच गया था।

प्रशासनिक गरिमा को ठेस और आचार संहिता के उल्लंघन पर दर्ज हुई थी एफआईआर

प्रशासनिक अधिकारियों और चुनाव आयोग ने आजम खान के इस बयान पर कड़ी आपत्ति जताई थी। आरोप था कि देश के एक सम्मानित दल के वरिष्ठ नेता द्वारा सार्वजनिक मंच से इस तरह की अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल करने से न केवल प्रशासनिक गरिमा और सेवा के इकबाल को ठेस पहुंची, बल्कि यह सीधे तौर पर चुनाव आचार संहिता का खुला उल्लंघन भी था। तत्कालीन प्रशासनिक टीम की शिकायत के बाद रामपुर के भोट थाने में आजम खान के खिलाफ आईपीसी की सुसंगत धाराओं और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था। स्थानीय पुलिस ने मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए त्वरित जांच शुरू की और जनसभा की वीडियो रिकॉर्डिंग समेत अन्य डिजिटल साक्ष्यों को कब्जे में लिया। पुलिस ने विवेचना पूरी करने के बाद तय समय सीमा के भीतर माननीय एमपी-एमएलए कोर्ट में आजम खान के खिलाफ पुख्ता चार्जशीट दाखिल कर दी थी।

अदालत में अभियोजन पक्ष की दलीलें और गवाहों की गवाही रही बेहद मजबूत

रामपुर की विशेष अदालत में इस हाई-प्रोफाइल मामले की सुनवाई लंबे समय तक चली। इस दौरान अभियोजन पक्ष ने सरकारी तंत्र और प्रशासनिक व्यवस्था के सम्मान को अक्षुण्ण रखने के लिए अदालत के समक्ष कई महत्वपूर्ण चश्मदीद गवाह, पुलिस अधिकारी और वीडियो की फॉरेंसिक रिपोर्ट पेश की। अभियोजन पक्ष के सरकारी वकीलों ने कोर्ट में पुरजोर दलील दी कि लोकतंत्र में किसी भी राजनेता को यह अधिकार नहीं है कि वह मंचों से शासकीय अधिकारियों को डराए-धमकाए या उनके आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाए। आजम खान की भाषा न केवल अपमानजनक थी, बल्कि वह समाज में लोक सेवकों के प्रति अविश्वास पैदा करने वाली थी। लंबी बहस, गवाहों के बयानों के परीक्षण और दोनों पक्षों की अंतिम दलीलों को गहराई से सुनने के बाद अदालत ने माना कि आजम खान पर लगे आरोप पूरी तरह सिद्ध होते हैं, जिसके बाद यह ऐतिहासिक सजा सुनाई गई।

आजम खान के सियासी सफर पर कानूनी संकट के बादल और गहरे हुए

एमपी-एमएलए कोर्ट का यह नया फैसला समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता के लिए एक और बड़ा कानूनी और राजनीतिक झटका माना जा रहा है। गौरतलब है कि आजम खान पिछले कुछ वर्षों से लगातार चौतरफा कानूनी लड़ाइयों में घिरे हुए हैं। उनके खिलाफ रामपुर के अजीम नगर थाने समेत विभिन्न थानों में शत्रु संपत्ति कब्जाने, फर्जी जन्म प्रमाणपत्र बनवाने, हेट स्पीच और चोरी समेत दर्जनों मुकदमे दर्ज हैं, जिनमें से कई मामलों में उन्हें पहले भी सजा हो चुकी है और उनकी विधानसभा सदस्यता भी रद्द हो चुकी है। बार-बार मिल रहे इन कानूनी झटकों के कारण न सिर्फ उनका राजनीतिक करियर दांव पर लगा है, बल्कि रामपुर की राजनीति में उनकी पकड़ भी कमजोर होती दिख रही है। कोर्ट के इस ताजा फैसले के बाद उत्तर प्रदेश के सियासी गलियारों में एक बार फिर बयानबाजी का दौर तेज हो गया है, जहां विपक्ष इसे राजनीतिक द्वेष बता रहा है, वहीं सत्तापक्ष इसे कानून का राज स्थापित होने का प्रमाण मान रहा है।

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