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अयोध्या में 15 से शुरू होगी अखिल भारतीय कला शिविर

सहभागी कलाकार बनेंगे अयोध्या की सांस्कृतिक पहचान के संवाहक

लखनऊ। भारत की सांस्कृतिक परंपरा में कुछ नगर केवल भौगोलिक स्थान नहीं होते, वे समय, स्मृति और सभ्यता के जीवंत प्रतीक बन जाते हैं। अयोध्या ऐसा ही एक नगर है, जिसकी पहचान केवल एक धार्मिक तीर्थ के रूप में सीमित नहीं है। यह भारतीय संस्कृति, दर्शन, साहित्य, लोक परंपराओं और मानवीय मूल्यों की ऐसी धरोहर है जिसने हजारों वर्षों से भारतीय मानस को प्रभावित किया है। बदलते समय के साथ अयोध्या का स्वरूप भी बदल रहा है। आधुनिक अवसंरचनाओं, अंतरराष्ट्रीय स्तर के विकास कार्यों और वैश्विक आकर्षण के केंद्र के रूप में उभरते इस नगर के सामने अब अपनी सांस्कृतिक बहुलता और रचनात्मक विरासत को व्यापक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करने का एक महत्त्वपूर्ण अवसर है। इसी उद्देश्य से कला दीर्घा, अंतर्राष्ट्रीय दृश्यकला पत्रिका तथा जेबीएनएस सोसायटी, अयोध्या के संयुक्त तत्वावधान में 15 से 19 जून 2026 तक आॅल इंडिया आर्टिस्ट कैंप कलर्स आॅफ अयोध्या का आयोजन किया जा रहा है। यह आयोजन केवल एक कला शिविर नहीं, बल्कि अयोध्या की सांस्कृतिक आत्मा को समकालीन भारतीय कला के माध्यम से देखने, समझने और अभिव्यक्त करने का एक महत्त्वाकांक्षी प्रयास है।
लंबे समय से यह अनुभव किया जा रहा था कि जिस नगर को विश्वभर में आध्यात्मिक और धार्मिक दृष्टि से जाना जाता है, वहाँ दृश्य कला, मंच कला, साहित्य और सांस्कृतिक संवाद की राष्ट्रीय स्तर की गतिविधियों को भी निरंतर प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। जिस प्रकार वाराणसी संगीत और संस्कृति का, जयपुर साहित्य और कला का, शांति निकेतन सृजनात्मक चिंतन का तथा कोच्चि समकालीन कला का वैश्विक केंद्र बन चुके हैं, उसी प्रकार अयोध्या में भी कला और संस्कृति की ऐसी गतिविधियों का विकास आवश्यक है जो इस नगर की बहुआयामी पहचान को नए संदर्भों में स्थापित कर सकें। ह्लकलर्स आॅफ अयोध्याह्व इसी दिशा में एक दूरगामी पहल है। शिविर की संरक्षक श्रीमती मंजुला झुनझुनवाला का मानना है कि अयोध्या के सांस्कृतिक पुनर्जागरण का यह समय केवल भौतिक विकास तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उनके अनुसार, ह्लकिसी भी नगर की वास्तविक पहचान उसकी सांस्कृतिक सक्रियता से निर्मित होती है। अयोध्या के पास अपार सांस्कृतिक पूँजी है। आवश्यकता इस बात की है कि उसे समकालीन अभिव्यक्तियों से जोड़ा जाए। ह्यकलर्स आॅफ अयोध्याह्ण इसी दिशा में उठाया गया एक सार्थक कदम है। हम चाहते हैं कि अयोध्या कला, साहित्य और संस्कृति के राष्ट्रीय विमर्श में भी उतनी ही प्रमुखता से उपस्थित हो, जितनी वह आध्यात्मिक जगत में है।
अयोध्या का सांस्कृतिक व्यक्तित्व अत्यंत व्यापक और बहुरंगी है। रामायण की कथा के माध्यम से यह नगर केवल भारतीय उपमहाद्वीप तक सीमित नहीं रहा, बल्कि दक्षिण-पूर्व एशिया सहित विश्व के अनेक देशों की सांस्कृतिक स्मृतियों का हिस्सा बना। यहाँ की लोकपरंपराएँ, रामलीला, लोकगीत, कथा-वाचन, मंदिर स्थापत्य, उत्सव और जनजीवन भारतीय सांस्कृतिक निरंतरता के जीवंत उदाहरण हैं। यही वह भूमि है जहाँ मयार्दा, करुणा, न्याय, त्याग और लोककल्याण जैसे जीवन-मूल्य सांस्कृतिक व्यवहार का हिस्सा बनकर विकसित हुए। साहित्य की दृष्टि से भी अयोध्या भारतीय रचनात्मकता की एक विराट प्रेरणाभूमि रही है। महर्षि वाल्मीकि की रामायण से लेकर गोस्वामी तुलसीदास की रामचरितमानस तक, असंख्य साहित्यकारों ने इस नगर की सांस्कृतिक स्मृतियों से प्रेरणा प्राप्त की है। हिंदी, अवधी, संस्कृत, उर्दू और अन्य भारतीय भाषाओं में रचित अनेक काव्य, गीत, नाटक और कथाएँ अयोध्या की सांस्कृतिक छवि को नए-नए रूपों में प्रस्तुत करती रही हैं। आज भी यह नगर लेखकों, कवियों, कलाकारों और शोधकतार्ओं के लिए उतना ही प्रेरणादायी है जितना सदियों पहले था। अवध क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान उन महान विभूतियों से भी निर्मित होती है जिन्होंने राष्ट्रीय जीवन में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। संगीत के क्षेत्र में बेगम अख्तर ने अवध की संवेदनशीलता, नजाकत और सौंदर्यबोध को वैश्विक प्रतिष्ठा प्रदान की। इसी परंपरा में अयोध्या के प्रख्यात पखावज वादक बाबा पागलदास का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्होंने पखावज वादन की प्राचीन परंपरा को नई प्रतिष्ठा प्रदान करते हुए उसे राष्ट्रीय स्तर पर विशिष्ट पहचान दिलाई। संगीत उनके लिए केवल कला नहीं, बल्कि साधना और आत्मानुभूति का माध्यम था। उनकी विलक्षण प्रतिभा, तपस्वी जीवनशैली और भारतीय शास्त्रीय संगीत के प्रति समर्पण ने उन्हें एक किंवदंती का स्वरूप प्रदान किया। साहित्य और शायरी की दुनिया में बशीर बद्र, वसीम बरेलवी और कुँवर नारायण जैसे रचनाकारों ने इस भूमि की मानवीय संवेदनाओं और सांस्कृतिक चेतना को नई ऊँचाइयाँ प्रदान कीं। समाजवादी चिंतन के क्षेत्र में डॉ. राममनोहर लोहिया ने भारतीय लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और समानता की अवधारणाओं को नई वैचारिक दिशा दी। यह समृद्ध विरासत अयोध्या और अवध को केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं रहने देती, बल्कि उसे भारतीय सांस्कृतिक परंपरा के एक जीवंत, सृजनशील और निरंतर विकसित होते केंद्र के रूप में स्थापित करती है। शिविर के क्यूरेटर डॉ. अवधेश मिश्र के अनुसार, कलर्स आॅफ अयोध्या वास्तव में भारत की विविध सांस्कृतिक सुवासों से सजा हुआ एक ऐसा गुलदस्ता है जिसमें विभिन्न प्रदेशों की कलात्मक परंपराएँ एक साथ उपस्थित होंगी। जब देश के अलग-अलग हिस्सों से आए कलाकार अयोध्या को अपनी दृष्टि से देखेंगे, तब इस नगर के अनेक ऐसे रूप सामने आएँगे जिन्हें सामान्यत: हम अनदेखा कर देते हैं। कला हमें परिचित वस्तुओं को भी नए ढंग से देखने की दृष्टि देती है। इस शिविर में नौ राज्यों से दस प्रतिष्ठित कलाकार भाग ले रहे हैं। इनमें बिहार से पद्मश्री श्याम शर्मा, महाराष्ट्र से रामचंद्र खरटमल और डगलस जॉन, हरियाणा से डॉ. राम विरंजन, गुजरात से कनु पटेल, तेलंगाना से अर्पिता रेड्डी, मध्य प्रदेश से तृप्ति जोशी, पश्चिम बंगाल से सुकांता दास, ओडिशा से मानस रंजन जेना तथा उत्तर प्रदेश से शिविर के क्यूरेटर डॉ. अवधेश मिश्र शामिल हैं। इन सभी कलाकारों की अपनी विशिष्ट कलाभाषा और रचनात्मक पहचान है। कोई लोक-संस्कृति और जनजीवन को केंद्र में रखकर कार्य करता है, कोई आध्यात्मिक प्रतीकों और सांस्कृतिक स्मृतियों के माध्यम से अपने विचार व्यक्त करता है, तो कोई समकालीन जीवन की जटिलताओं को रूप और रंग में अभिव्यक्त करता है। इन विविध दृष्टियों का संगम इस शिविर को केवल एक कला आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक विविधता के सृजनात्मक उत्सव में परिवर्तित कर देगा।

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