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कठपुतलियों के जरिए लखनऊ की आलिया ने दिया पर्यावरण का संदेश

कक्षा नौ की छात्रा आलिया का चयन प्रतिष्ठित स्लिंगशाट चैलेंज में हुआ
लखनऊ। दर्जियों की दुकानों के बाहर पड़े कतरन के ढेर अधिकांश लोगों के लिए बेकार होते हैं, लेकिन 14 वर्षीय आलिया फातिमा रिजवी ने इन्हीं टुकड़ों में एक नया सपना देखा। ऐसा सपना, जिसने न केवल पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया बल्कि लखनऊ की सांस्कृतिक विरासत को भी दुनिया के सामने नए रूप में प्रस्तुत कर दिया। लॉ मार्टिनियर गर्ल्स कॉलेज की कक्षा नौ की छात्रा आलिया का चयन प्रतिष्ठित स्लिंगशाट चैलेंज में हुआ है, जिसे नेशनल ज्योग्राफिक और डिज्नी आयोजित करते हैं। इस उपलब्धि के साथ उन्हें एक हजार डालर की पुरस्कार राशि भी मिलेगी, जो वर्तमान विनिमय दर के अनुसार लगभग 95 से 96 हजार रुपये के बराबर है। आलिया बताती हैं कि इस विचार की शुरूआत किसी प्रयोगशाला या बड़े शोध केंद्र में नहीं, बल्कि लखनऊ की सड़कों पर हुई। जब वह अपने माता-पिता के साथ पुराने बाजारों में जाती थीं, तब अक्सर दर्जियों की दुकानों और सिलाई केंद्रों के बाहर कपड़ों की कतरनें बिखरी दिखाई देती थीं। उनके मन में सवाल उठता था कि आखिर इन कपड़ों का क्या होता होगा। अधिकांश कतरन कचरे में चली जाती थी। यहीं से उनके मन में विचार आया कि क्यों न लोगों को इसके प्रति जागरूक किया जाए और बेकार समझी जाने वाली सामग्री को उपयोगी बनाया जाए। इसी दौरान उन्हें लखनऊ की प्रसिद्ध गुलाबो-सिताबो परंपरा याद आई। कठपुतलियों के माध्यम से कहानी कहने की यह कला शहर की पहचान रही है। आलिया ने सोचा कि यदि कपड़ों की कतरन से कठपुतलियां बनाई जाएं और उनके जरिए पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया जाए, तो एक साथ दो काम हो सकते हैं कचरा कम होगा और लखनऊ की विरासत भी नई पीढ़ी तक पहुंचेगी। इसके बाद उन्होंने स्क्रैप फैब्रिक और अन्य बेकार सामग्री से कठपुतलियां बनाने की अवधारणा पर काम शुरू किया। उनका माडल केवल वस्तुएं बनाने तक सीमित नहीं है। इसमें बच्चों को शामिल करना, कार्यशालाएं आयोजित करना और कहानियों के माध्यम से पर्यावरण के प्रति संवेदनशील बनाना भी शामिल है। उनका मानना है कि बच्चे किताबों की तुलना में कहानियों और गतिविधियों से अधिक सीखते हैं।आलिया के प्रयासों का असर स्थानीय स्तर पर भी दिखाई देने लगा है। वे लगातार अपने आसपास के बच्चों और साथियों को समझाती हैं कि किसी भी वस्तु को तुरंत कचरा मानकर फेंकना जरूरी नहीं है। उसका दोबारा उपयोग किया जा सकता है। कई बच्चे और युवा उनके विचारों से प्रेरित होकर बेकार सामग्री से उपयोगी वस्तुएं बनाने और पर्यावरण से जुड़े छोटे-छोटे प्रयास करने लगे हैं। यह वैश्विक प्रतियोगिता दुनिया भर के युवाओं को पर्यावरण से जुड़ी समस्याओं के व्यावहारिक और रचनात्मक समाधान खोजने के लिए प्रेरित करती है। इस वर्ष इसमें 100 से अधिक देशों के हजारों प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया था, लेकिन आलिया के अनूठे विचार ने शीर्ष में अपनी जगह बनाई। साथ ही आगामी अक्टूबर में उन्हें वाशिंगटन डीसी (अमेरिका) आमंत्रित किया गया है, जहां दुनिया भर के युवा चेंजमेकर्स के साथ उन्हें सम्मानित किया जाएगा। आलिया कहती हैं कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारों या बड़े संगठनों की जिम्मेदारी नहीं है। हर व्यक्ति अपने स्तर पर बदलाव ला सकता है। उनका संदेश है कि जीवन में कठिनाइयां आएंगी, लेकिन उन्हें रास्ते की रुकावट नहीं बनने देना चाहिए। कठिनाइयां अस्थायी होती हैं, जबकि प्रयास और सीख हमेशा साथ रहते हैं। इसलिए कभी रुकना नहीं चाहिए और हमेशा कुछ नया तथा सकारात्मक करने की कोशिश करनी चाहिए। सिर्फ 14 वर्ष की उम्र में आलिया ने यह साबित कर दिया है कि बड़ा बदलाव लाने के लिए बड़ी उम्र की नहीं, बड़ी सोच की जरूरत होती है। लखनऊ की गलियों में बिखरी कपड़ों की कतरन से शुरू हुई यह कहानी आज अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंच चुकी है। यह केवल एक छात्रा की सफलता नहीं, बल्कि इस बात का प्रमाण है कि स्थानीय समस्याओं का समाधान खोजने वाली सोच दुनिया भर में पहचान बना सकती है।

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